अविनाश चंद्रा(एमसीबी)
Chhattisgarh: मनेंद्रगढ़ चिरमिरी भरतपुर जिले के विकासखंड भरतपुर अंतर्गत जनकपुर क्षेत्र, जो आदिवासी बहुल इलाका है, वहां आज भी सदियों पुरानी परंपराएं जीवंत हैं. होली पर्व से पहले यहां बैगा समाज द्वारा निभाई जाने वाली ‘निकारि’ प्रथा आज भी आस्था और विश्वास के साथ संपन्न की जाती है. ग्रामीणों का मानना है कि इस पारंपरिक अनुष्ठान से गांव को आपदा और महामारी से संरक्षण मिलता है.
होली से पहले गांव में होती है पूजा
जनकपुर निवासी पुजारी गरीबा मौर्य ने बताया कि जब से जनकपुर बसा है, तब से बैगा समाज द्वारा यह प्रथा निभाई जा रही है. उन्होंने बताया कि ‘डांग न गढ़ने’ से पहले होली के पूर्व इस अनुष्ठान को विशेष रूप से किया जाता है. पूर्व में गांव के बैगा इस परंपरा का निर्वहन करते थे और वर्ष 2006 से वे स्वयं ठाकुर बाबा से जुड़े हैं तथा तभी से इस प्रथा को सुचारू रूप से निभा रहे हैं.
गरीबा मौर्य के अनुसार, निकारि प्रथा का उद्देश्य गांव में किसी भी प्रकार की आपदा या विपत्ति को प्रवेश करने से रोकना है. विशेषकर हैजा, कॉलरा जैसी गंभीर बीमारियों से गांव को सुरक्षित रखने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है. उन्होंने बताया कि इस परंपरा के तहत बैगा द्वारा मुर्गी चराई जाती है. गांव के हर चौक-चौराहे पर यह प्रक्रिया पूरी की जाती है, जिससे नकारात्मक शक्तियों और बीमारियों को गांव की सीमा से बाहर रखने की मान्यता है.
फिर गांव के बाहर छोड़ी जाती है मुर्गी
ग्रामीणों की मान्यता है कि निकारि करने के बाद मुर्गी को गांव की सीमा पार, नदी के उस पार छोड़ दिया जाता है, जिससे किसी भी प्रकार की आपत्ति गांव में प्रवेश न कर सके. इस अवसर पर गांव के टोला-मोहल्लों के लोग बैगा को अखत, झाड़ू और अन्य पूजन सामग्री उपलब्ध कराते हैं। पूरा गांव सामूहिक रूप से इस परंपरा में भागीदारी निभाता है.
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गरीबा मौर्य ने कहा कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गांव की एकजुटता और सामूहिक सुरक्षा का प्रतीक है. उन्होंने सभी ग्रामीणों से इस परंपरा के प्रति जागरूक और सक्रिय रहने की अपील की, ताकि गांव सुरक्षित रहे और सुख-समृद्धि बनी रहे. ग्रामीणों का विश्वास है कि इस प्रथा के प्रभाव से गांव में शांति, समृद्धि और निरोगी जीवन बना रहता है. जनकपुर क्षेत्र में आज भी परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाए रखते हुए ऐसी लोक आस्थाएं समाज को एक सूत्र में बांधे हुए हैं.
