Narayanpur News: कभी नक्सल हिंसा और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण देश-दुनिया से लगभग कटा रहा अबूझमाड़ अब बदलाव की नई कहानी लिख रहा है. जिस कोहकापार गांव में आज तक किसी बच्चे ने अपने गांव में स्कूल नहीं देखा था, वहां अब पहली बार स्कूल की घंटी गूंज उठी है.
गांव तक पहुंचना आसान नहीं
जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है. उफनते नदी-नाले, ऊंचे पहाड़, घने जंगल और संकरे पगडंडी रास्तों को पार करने के बाद ही कोहकापार पहुंचा जा सकता है. इन्हीं कठिन रास्तों को बाइक से तय कर कलेक्टर नम्रता जैन गांव पहुंचीं और पहली प्राथमिक शाला का शुभारंभ किया. यह केवल एक स्कूल का उद्घाटन नहीं था, बल्कि उन बच्चों के लिए नए भविष्य का दरवाजा खुलने जैसा था, जो वर्षों से शिक्षा के अधिकार से वंचित थे.
‘स्कूल केइंता’ अभियान के तहत मिला अधिकार
‘स्कूल केइंता’ अभियान के तहत घर-घर सर्वे कर ऐसे बच्चों की पहचान की गई जो कभी स्कूल नहीं गए या बीच में पढ़ाई छोड़ चुके थे. इसी अभियान के तहत कोहकापार में पहली बार प्राथमिक शाला शुरू की गई. पहले ही दिन 21 बच्चों का नामांकन हुआ, जिनमें 11 बेटियां और 10 बेटे शामिल हैं.
कलेक्टर नम्रता जैन ने बच्चों का पारंपरिक मुकुट पहनाकर स्वागत किया, उन्हें स्कूल बैग और किताबें भेंट कीं तथा घोटूल में लग रही कक्षा में स्वयं पढ़ाकर शिक्षा के प्रति अपना जुड़ाव भी दिखाया. बच्चों के चेहरों पर पहली बार स्कूल जाने की खुशी साफ दिखाई दे रही थी.
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कलेक्टर ने किया ‘माड़ संवाद’
स्कूल के उद्घाटन के बाद कलेक्टर ने गांव में ‘माड़ संवाद’ के तहत चौपाल लगाई. ग्रामीणों से सीधे बातचीत कर शिक्षा, स्वास्थ्य, आंगनबाड़ी, पोषण और सरकारी योजनाओं की जमीनी स्थिति की जानकारी ली. गांव के लोगों ने बिजली, नल-जल योजना, मोबाइल टावर और अन्य बुनियादी सुविधाओं की मांग रखी, जिस पर कलेक्टर ने संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए.
कलेक्टर ने क्या कहा?
कलेक्टर ने कहा कि ‘स्कूल केइंता’ अभियान का उद्देश्य अबूझमाड़ के किसी भी बच्चे को शिक्षा से वंचित नहीं रहने देना है. अभियान के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं और अब तक जिले के 2,000 से अधिक बच्चों को शासकीय विद्यालयों एवं छात्रावासों में प्रवेश दिलाया जा चुका है. कोहकापार में पहली बार स्कूल खुलना इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है.
एक समय था जब अबूझमाड़ की पहचान केवल दुर्गम जंगलों और नक्सल हिंसा से होती थी. आज वहीं शिक्षा की रोशनी सबसे कठिन पहाड़ियों को पार कर बच्चों तक पहुंच रही है. कोहकापार में गूंजी पहली स्कूल की घंटी इस बात का संकेत है कि अबूझमाड़ में बदलाव की दस्तक केवल सड़कों तक नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य तक पहुंच चुकी है.
