Bilaspur News: छत्तीसगढ़ के गेहूं किसानों के लिए अच्छी खबर है. इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के अंतर्गत बिलासपुर में संचालित अखिल भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान परियोजना के वैज्ञानिकों ने गेहूं की नई बायोफोर्टिफाइड किस्म CG 1047 (छत्तीसगढ़ ट्रॉम्बे कुमुद) विकसित की है. इस किस्म को 2025 में गेहूं वैज्ञानिकों की कार्यशाला में पहचान मिली. इसे खासतौर पर कम सिंचाई वाले क्षेत्रों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.
10 साल के शोध का नतीजा
CG 1047 को करीब 10 वर्षों के लगातार अनुसंधान के बाद विकसित किया गया. इसमें गेहूं वैज्ञानिक डॉ. अजय प्रकाश अग्रवाल का प्रमुख योगदान रहा. इसक विकास में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, ट्रॉम्बे, मुंबई के वैज्ञानिकों का भी सहयोग मिला. यहां किस्म के सूक्ष्म गुणों का परीक्षण किया गया.
आयरन-जिंक से भरपूर
यह किस्म पोषण के लिहाज से भी खास है. इसमें आयरन 41.7 पीपीएम, जिंक 41.7 पीपीएम और 12 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन पाया गया है. चपाती मेकिंग स्कोर 8.0/10 और बिस्किट स्प्रेडिंग स्कोर 8.7/10 होने से यह चपाती और बिस्किट दोनों के लिए उपयोगी है.
2-3 सिंचाई में भी अच्छी पैदावार
CG 1047 को अधिसिंचित परिस्थितियों के लिए विकसित किया गया है. 2-3 सिंचाई में भी इसकी अच्छी उपज क्षमता देखी गई है. इसका औसत उत्पादन करीब 36.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज किया गया है. समय पर बुवाई और बेहतर प्रबंधन से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है.
किस्म की क्या हैं विशेषताएं?
इसका पैरेंट HW 2004/PSS 725 है. पौध की ऊंचाई 85-90 सेंटीमीटर, 1000 दानों का वजन करीब 41.5 ग्राम और फसल अवधि 107-110 दिन है. दानों का रंग अम्बर यानी गेहुआं है.
ये भी पढ़ें-कृषि शिक्षक भर्ती में बीएड की अनिवार्यता पर बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, छूट की मांग खारिज
कई वैज्ञानिकों का सामूहिक प्रयास
इस किस्म का विकास कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल, संचालक अनुसंधान डॉ. विवेक त्रिपाठी के मार्गदर्शन और बिलासपुर केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सजय कुमार वर्मा ने किया है. इसमें डॉ. एन.के. चौरे, डॉ. एस.के. सिन्हा, डॉ. सुनील नाग, डॉ. डी.जे. शर्मा और तकनीकी सहायक माधुरी ग्रेस मिंज का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा
