CG News: बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा जिले के दीपका स्थित लाइफकेयर अस्पताल में मिले भ्रूणों के मामले में अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने दो डॉक्टरों और एक महिला को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी अधिनियम की धारा 5 और भारतीय दंड संहिता की धारा 315 के आरोपों से बरी करने के निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए अभियोजन पक्ष का मामला सिद्ध माना है. हालांकि, पीसी-पीएनडीटी अधिनियम की धारा 22(3) के तहत हुई बरी को बरकरार रखा गया है. मामले में सजा के प्रश्न पर सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को होगी. इस मामले में Dr. Rajendra Prasad Ravidas, Dr. Mithilesh Prasad और mt. Renu Shrivastav, W/o Dr. Mithilesh Prasad को आरोपी बनाया गया है.
मामला वर्ष 2011 का है. 5 अगस्त 2011 को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कटघोरा के ब्लॉक मेडिकल अधिकारी ने लाइफकेयर अस्पताल में अचानक निरीक्षण के दौरान ऑपरेशन थिएटर में भ्रूण और आपत्तिजनक उपकरण मिलने की जानकारी पुलिस को दी थी. इसके बाद 7 अगस्त को स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अस्पताल का निरीक्षण किया. दस्तावेजों के अनुसार अस्पताल में अलग-अलग उम्र के भ्रूण संरक्षित हालत में मिले थे. इसी आधार पर दीपका थाने में अपराध दर्ज कर जांच के बाद आरोप पत्र पेश किया गया था. (CG illegal abortion case conviction)
मामले में निचली अदालत ने 31 अगस्त 2016 को अभियोजन के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं मानते हुए तीनों आरोपियों को बरी कर दिया था. इसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील की थी. हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष के साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण किया.
हाईकोर्ट के अनुसार अस्पताल में 16 से 32 सप्ताह तक के पांच भ्रूण मिले थे. अदालत ने माना कि बचाव पक्ष इन भ्रूणों के अस्पताल में पाए जाने के तथ्य को प्रभावी ढंग से खारिज नहीं कर सका. कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपियों की ओर से यह साबित नहीं किया गया कि गर्भपात कानून में निर्धारित परिस्थितियों के तहत और महिला की जान बचाने के लिए सद्भावपूर्वक किया गया था.
पुलिस की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी
कोर्ट ने पीसी-पीएनडीटी अधिनियम की धारा 28 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अधिनियम के तहत अपराध का संज्ञान निर्धारित प्राधिकारी की शिकायत पर ही लिया जा सकता है. अदालत ने माना कि इस मामले में पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज कर जांच और आरोप पत्र पेश करने की प्रक्रिया पीसी-पीएनडीटी अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी. इसलिए इस अधिनियम की धारा 22(3) के तहत आरोपियों की बरी को बरकरार रखा गया.
फैसले में हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस पीसी-पीएनडीटी अधिनियम के तहत मुख्य जांच एजेंसी नहीं हो सकती. हालांकि, अन्य स्वतंत्र आपराधिक अपराध सामने आने पर पुलिस की भूमिका अलग हो सकती है.
12 अक्टूबर को सजा पर सुनवाई
हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में धारा 5, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी अधिनियम और धारा 315 आईपीसी के तहत की गई बरी को रद्द कर दिया. अदालत ने इन दोनों धाराओं के तहत अभियोजन का मामला सिद्ध माना है. वहीं पीसी-पीएनडीटी अधिनियम की धारा 22(3) में बरी को कायम रखा. अब तीनों आरोपियों को सजा के सवाल पर सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर को अदालत में उपस्थित होना होगा.
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