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13 साल, 101 गवाह और 31 मौतें… छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी नरसंहार की पूरी कहानी

झीरम घाटी हत्‍याकांड

झीरम घाटी हत्‍याकांड

Jhiram Ghati Attack: छत्तीसगढ़ के इतिहास में आज भी किसी नरसंहार को सुनकर कोई डरता है, तो वह है झीरम घाटी हत्याकांड. इस हत्याकांड मामले में अब NIA कोर्ट ने सभी 10 आरोपियों को दोषी ठहराया है. 16 सितंबर को तय किया जाएगा कि आखिर आरोपियों को कोर्ट कौन सी सजा देता है. इस तरह के मामले में फांसी से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है. कोर्ट के इस फैसले के बाद अब कांग्रेस ने नाराजगी जाहिर की है. नेताओं का कहना है कि जिन लोगों को सजा दी जा रही है, वो बहुत छोटे कैडर के नक्सली हैं. जबकि असली गुनहगारों को बचाया जा रहा है, चलिए अब जानते हैं कि आखिर 13 साल पहले साल 2013 में  25 मई को क्‍या-क्‍या हुआ था?

10 साल से सत्ता में काबिज रमन सिंह को हटाने के लिए पूरे जोर आजमाइश की जा रही थी.  साल 2013 चुनावी साल था, उस समय कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए जमीन पर मेहनत करती नजर आ रही थी. प्रदेश कांग्रेस समेत देश के कई नेता बस्तर की धूल फांक रहे थे. लोगों से मिलकर उनकी समस्याओं को जान रहे थे. इसी कड़ी में 25 मई को कांग्रेस की तरफ से सुकमा में परिवर्तन रैली आयोजित की गई. इसी दिन छत्तीसगढ़ के इतिहास का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ था, जिसमें कांग्रेस नेताओं को निशाना बनाया गया था. 

नक्सलियों ने कांग्रेस की टॉप लीडरशिप को बनाया था निशाना

ऐसा कहा जाता है कि कांग्रेस की यह रैली सफल रही. वहां जमकर भीड़ पहुंची. जहां कांग्रेस नेताओं ने 10 साल से सत्ता में काबिज रमन सिंह की सरकार को हटाने की बात कही. रैली खत्म कर कांग्रेस के नेता अपने-अपने जगदलपुर की तरफ लौटने लगे. नक्सली इलाका होने के कारण काफिला एक साथ ही चल रहा था, कुल मिलाकर 25 गाड़ियां तेज स्पीड में चल रही थीं, जिनमें 20 से ज्यादा नेता सवार थे.

इनमें उस समय के कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कवासी लखमा के अलावा भी कई लोग थे. महेंद्र कर्मा और मलकीत सिंह गैदू की गाड़ियां भी मौजूद थीं, जिनमें वह खुद ही सवार थे. कुल मिलाकर कहा जाए तो बस्तर के जंगलों में छत्तीसगढ़ कांग्रेस की टॉप लीडरशिप सफर कर रही थी.

काफिला शाम करीब 4 बजे झीरम घाटी से गुजरा, वहां माहौल बिल्कुल बदल गया. यहां करीब 200 से ज्यादा नक्सली पहले से ही घात लगाकर बैठे हुए थे. गाड़ियों को देखते ही सभी ने एक साथ फायरिंग शुरू कर दी. काफिले में मौजूद नेता कुछ समझ पाते उससे पहले ही कई नेताओं की मौत हो चुकी थी. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश की मौके पर ही मौत हो गई. ऐसा कहा जाता है कि 2 घंटे से ज्यादा समय तक ताबड़तोड़ फायरिंग होती रही.

मारे गए नेताओं के शवों के साथ की बर्बरता

नक्सलियों ने इस तरह गोलियां चलाई थी कि कोई न बच सके. हालांकि कुछ गाड़ियां आगे निकल गईं, जिसकी वजह से कुछ नेता बच गए. शाम 5 बजे नक्सली सड़क पर आ गए. गाड़ियों को चेक किया और पता किया कि कौन जिंदा बचा और कौन मर गया. वहां जितने भी लोग थे नक्‍सल‍ियों ने सभी पर गोलियां फिर से चलाईं और चाकुओं से हमला किया. कई शवों पर 100 से ज्यादा चाकू के निशान मिले थे.

दूसरी तरफ जो लोग जिंदा बचे उन्‍हें बंधक बनाया गया. कुल मिलाकर 31 नेताओं की मौत हुई थी. इस हमले में अजीत जोगी को छोड़कर छत्तीसगढ़ कांग्रेस के सभी बड़े नेता मारे गए थे.

कौन था नक्सलियों के निशाने पर?

नक्सलियों के इस हमले का टारगेट महेंद्र कर्मा थे. ऐसा कहा जाता है कि सलवा जुडूम का नेतृत्व करने की वजह से ही नक्सलियों के निशाने पर थे. पोस्टमार्टम में सामने आया था कि उनके शरीर पर 100 गोलियां और 50 चाकू के निशान थे. इसके बाद नक्सलियों उनके शव पर चढ़कर डांस भी किया था. यह हमला छत्तीसगढ़ के इतिहास में आज भी सबसे डरावना है.

13 साल बाद आया फैसला

13 साल पहले हुए इस हमले में  जगदलपुर स्थित NIA कोर्ट ने सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है. इस केस में 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चली थी। एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है. पूरे मामले में 101 गवाहों के बयान और दस्तावेज पेश किए थे. तो वहीं कोर्ट के इस फैसले पर पीड़ितों का कहना है कि असली कातिल अब भी बाहर हैं. उन्‍हें कभी पकड़ा ही नहीं गया. सभी दोषियों को 16 दिसंबर को सजा सुनाई जा सकती है.

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