Input- Yogesh Rajput
मगरमच्छ को आमतौर पर इंसानों के लिए एक खतरनाक जीव के रूप में जाना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले की यह कहानी थोड़ी अलग है. जिले का एक छोटा-सा गांव बावा मोहतरा आज भी एक ऐसे मगरमच्छ की यादों को संजोए हुए है, जिसने इंसानों और वन्यजीवों के बीच भरोसे और सह-अस्तित्व की मिसाल कायम की. इस मगरमच्छ का नाम था गंगाराम. ग्रामीणों के अनुसार, वह वर्षों तक गांव के तालाब में रहा, लेकिन उसने कभी किसी इंसान या मवेशी को नुकसान नहीं पहुंचाया.
गंगाराम मगरमच्छ बना गांव की पहचान
बेमेतरा जिले के बावा मोहतरा गांव के बीच स्थित तालाब में रहने वाला गंगाराम मगरमच्छ गांव की पहचान बन गया था. गांव की महिलाएं इसी तालाब से पानी भरती थीं, किसान अपने मवेशियों को पानी पिलाने लाते थे और बच्चे तालाब किनारे खेलते थे. कई बार ग्रामीणों का तालाब में नहाते समय गंगाराम से आमना-सामना भी हुआ. ग्रामीण बताते हैं कि कई बच्चे और लोग पानी के भीतर उससे टकरा भी जाते थे, लेकिन गंगाराम खुद ही रास्ता बदल लेता था और कभी किसी पर हमला नहीं करता था.
देश और विदेश तक पहुंची चर्चा
गंगाराम के शांत स्वभाव की चर्चा धीरे-धीरे पूरे देश और विदेश तक पहुंची. पर्यटक और वन्यजीव विशेषज्ञ बावा मोहतरा पहुंचे और इंसान तथा वन्यजीव के बीच बने इस अनोखे रिश्ते को करीब से देखा. इस वजह से बेमेतरा जिले को भी एक अलग पहचान मिली.
गंगाराम की मौत के बाद पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई. ग्रामीणों ने उसे परिवार के सदस्य की तरह सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई दी. यह भावुक दृश्य देशभर में चर्चा का विषय बना था.
नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल
अब गंगाराम की प्रेरक कहानी नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल की जा रही है. बच्चों को कहानी के रूप में गंगाराम और बावा मोहतरा की यह अनोखी मिसाल सुनाई जा रही, ताकि उनमें प्रकृति, वन्यजीव संरक्षण और सह-अस्तित्व के प्रति संवेदनशीलता विकसित हो सके.हालांकि, वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी भी जंगली जानवर से सुरक्षित दूरी बनाए रखना और उनके प्राकृतिक आवास का सम्मान करना हमेशा आवश्यक है.
एक दुर्लभ और प्रेरणादायक उदाहरण
गंगाराम की कहानी एक दुर्लभ और प्रेरणादायक उदाहरण है, जो यह संदेश देती है कि प्रकृति के प्रति सम्मान और जिम्मेदार व्यवहार से इंसान और वन्यजीवों के बीच संतुलित सह-अस्तित्व संभव है.
बावा मोहतरा का गंगाराम आज भले ही इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को यह सीख देती रहेगी कि विश्वास, संवेदनशीलता और प्रकृति के प्रति सम्मान से सह-अस्तित्व की एक नई मिसाल कायम की जा सकती है.
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