रायपुर. दीपावली पर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और पारंपरिक हस्तशिल्प की झलक राजधानी के बाजारों में दिखाई देने लगी है. धान की सुनहरी बालियों से तैयार झालर, झूमर, चिरई-चुगनी और बिच्छू झालर की मांग बढ़ गई है. बूढ़ेश्वर चौक, गोलबाजार सहित शहर के प्रमुख बाजारों और मुख्य मार्गों के किनारे किसानों ने अपनी दुकानें सजाई हैं. खरोरा, आरंग और अमलेश्वर क्षेत्र से आए किसान पारंपरिक सजावटी सामग्रियों की बिक्री कर रहे हैं. इनकी कीमत 20 से 150 रुपए तक है. (CG Diwali Dhan Jhalar-Jhoomar)
छत्तीसगढ़ में धान को धन-धान्य, समृद्धि और माता लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि दीपावली पर घरों के मुख्य द्वार और पूजा स्थल को धान की बालियों से बने झालर और झूमर से सजाने की विशेष परंपरा है. आधुनिक सजावटी सामानों के बीच भी इन पारंपरिक कलाकृतियों के प्रति लोगों का आकर्षण बना हुआ है. इस बार बाजारों में इनकी पूछपरख बढ़ने से किसानों और ग्रामीण कारीगरों को भी अच्छी बिक्री की उम्मीद है. (CG Diwali Dhan Jhalar-Jhoomar)
धान की बालियों में समृद्धि और लक्ष्मी का प्रतीक
पं. मनोज शुक्ला के अनुसार, धान की बालियों से तैयार झालर को छत्तीसगढ़ में चिरई-चुगनी या झालर-झूमर के नाम से पहचाना जाता है. इसका दीपावली और फसल कटाई से गहरा धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंध है. धान की बालियों को धान्य लक्ष्मी और धन-धान्य की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि दीपावली पर इन्हें घर में सजाने और पूजन करने से सुख-समृद्धि और बरकत बनी रहती है. दीपावली का समय नई धान की फसल के पकने और घर आने का भी होता है, इसलिए इनसे बनी सजावटी सामग्रियों का महत्व और बढ़ जाता है.
20 साल से बूढ़ेश्वर चौक पर सजा रहे दुकान
धान की बालियों से तैयार पारंपरिक कलाकृतियों की बिक्री करने वाले किसानों से बातचीत की गई. खरोरा से आए किसान लोमस पारधी और मंताराम ने बताया कि वे पिछले 20 वर्षों से दीपावली के पहले बूढ़ेश्वर चौक के पास दुकान लगाते आ रहे हैं. विजयादशमी के बाद खेतों से धान की बालियां काटकर उनसे अलग-अलग तरह की कलाकृतियां तैयार करने का काम शुरू हो जाता है. दीपावली से करीब एक सप्ताह पहले परिवार के साथ दुकान सजाने पहुंचते हैं.
उन्होंने बताया कि यहां अच्छी ग्राहकी मिलने से त्योहार के दौरान परिवार के लिए अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती है. 20 से 150 रुपए तक की कीमत में अलग-अलग आकार और डिजाइन के झालर-झूमर उपलब्ध हैं. पहले कुछ किसान ही इस तरह की दुकानें लगाते थे, लेकिन अब शहर के कई हिस्सों में इनके लिए अलग से बाजार सजने लगे हैं. (CG Diwali Dhan Jhalar-Jhoomar)
पारंपरिक हस्तशिल्प को मिल रही प्राथमिकता
कमलेश साहू और भागीरथी निषाद के मुताबिक धान की सुनहरी बालियों को बारीकी से आपस में गूंथकर आकर्षक तोरण और झालर तैयार किए जाते हैं. ग्रामीण कलाकार अपनी कला और मेहनत से इन्हें सुंदर आकार देते हैं. लोग सुख-समृद्धि की कामना के साथ इन्हें घरों के मुख्य दरवाजों पर सजाते हैं.
उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में भी लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहना चाहते हैं. यही वजह है कि प्लास्टिक और चाइनीज सजावटी झालरों के साथ-साथ अब इको-फ्रेंडली और पारंपरिक हस्तशिल्प को भी प्राथमिकता मिल रही है. इससे स्थानीय किसानों, कारीगरों और महिला स्व-सहायता समूहों को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं. त्योहारी सीजन में लगने वाले ये स्टॉल ग्रामीण कला और स्थानीय मेहनत को बाजार में पहचान दिलाने का माध्यम भी बन रहे हैं.
