Balrampur: छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा वित्तीय अनियमितता का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है. राजपुर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में आयुष्मान भारत योजना के तहत वित्तीय गड़बड़ी का मामला सामने आया है.
खास बात यह है कि इस मामले में महालेखाकार (AG) की ऑडिट में भी गंभीर अनियमितताएं सामने आ चुकी हैं, इसके बावजूद अब तक जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. मामले की गंभीरता को देखते हुए बलरामपुर कलेक्टर और स्वास्थ्य विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर ने जांच के निर्देश दिए हैं, लेकिन जिस गति से विभागीय जांच आगे बढ़ रही है, उसे लेकर अब सवाल उठने लगे हैं.
AG ऑडिट में गड़बड़ी सामने आने के बाद भी विभागीय जांच क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब महालेखाकार की ऑडिट में वित्तीय अनियमितता सामने आ चुकी है, तो फिर उसी मामले में विभागीय जांच की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों खींची जा रही है? आरोप है कि जांच की धीमी गति के कारण मामले में जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को राहत मिल रही है. यही वजह है कि अब जांच दल की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. मामले से जुड़े लोगों का आरोप है कि जिस तरीके से जांच की जा रही है, उससे यह आशंका पैदा हो रही है कि जांच रिपोर्ट में जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारियों को बचाने की कोशिश की जा सकती है. हालांकि इसकी पुष्टि जांच पूरी होने और आधिकारिक रिपोर्ट सामने आने के बाद ही हो सकेगी.
निर्धारण समिति की बैठक के बिना लाखों की खरीदी का आरोप
मामले में गंभीर आरोप यह है कि राजपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में निर्धारण समिति की विधिवत बैठक और अनुमोदन के बिना ही लाखों रुपये की खरीदी की गई. सरकारी राशि से किसी भी प्रकार की खरीदी के लिए निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया जाना जरूरी है. ऐसे में यदि बिना समिति की बैठक और आवश्यक प्रक्रिया के खरीदी की पुष्टि होती है, तो यह सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है. अब जांच में यह सामने आना बेहद जरूरी है कि खरीदी का निर्णय किसने लिया, भुगतान किस स्तर पर स्वीकृत हुआ और इस पूरी प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका रही.
जांच दल की रिपोर्ट पर भी निगाहें
मामले में अब जांच दल द्वारा तैयार की जाने वाली रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है. सवाल यह है कि क्या जांच रिपोर्ट में सिर्फ प्रक्रियागत कमियों का उल्लेख किया जाएगा या फिर जिम्मेदारी भी तय की जाएगी. यदि जांच में केवल औपचारिकताएं पूरी कर मामले को खत्म करने की कोशिश की जाती है, तो इससे महालेखाकार की ऑडिट में सामने आई गंभीर वित्तीय अनियमितताओं और विभागीय जांच आमने सामने हो सकते हैं. वहीं, यदि जांच निष्पक्ष तरीके से होती है तो खरीदी से लेकर भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया की जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान की जा सकती है.
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