Assi Movie Review: जिस वक्त आप ये रिव्यू पढ़ रहे हैं, उस वक्त भी देश में एक रेप हो रहा है. हर 20 मिनट पर एक रेप होता है और 24 घंटे में कुल रेप होते हैं अस्सी. अगर आपको बॉलीवुड फिल्में पसंद नहीं हैं, फिल्में देखने का शौक नहीं है, फिल्मी सितारों को नापसंद करते हैं, तब भी अगर जिंदगी में कोई एक फिल्म देखनी हो तो ये फिल्म देखिएगा, क्योंकि ये फिल्म देखना जरूरी है. बहुत जरूरी है. ऐसी फिल्में बनना जरूरी है. क्योंकि फिल्में समाज का आइना होती हैं और आपको ये जानना चाहिए कि समाज में क्या हो रहा है. हो सकता है ऐसी फिल्मों से समाज में थोड़ा सुधार ही आ जाए.
कहानी
कहानी स्कूल टीचर परिमा (कनी कुश्रुति) की है, जो अपने पति विनय (जीशान अय्यूब) और बेटे ध्रुव (अद्विक जायसवाल) के साथ रहती है. एक दिन स्कूल की एक टीचर की फेयरवेल पार्टी से लौटते वक्त कुछ लड़के उसका अपहरण कर लेते हैं. उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म करते हैं और फिर उसे बुरी हालत में रेलवे पटरी के पास फेंक देते हैं. इसके बाद शुरू होती है उसके इंसाफ की लड़ाई. इस लड़ाई में उसका साथ देती हैं वकील रावी (तापसी पन्नू). रावी, विनय के दोस्त कार्तिक (कुमुद मिश्रा) की मुंहबोली बहन हैं. कार्तिक की पत्नी कावेरी (दिव्या दत्ता) की भी एक सड़क हादसे में मौत हो चुकी है, जिसका इंसाफ अब तक नहीं मिला. इसी वजह से कार्तिक के मन में समाज और न्याय प्रणाली के प्रति गहरी नफरत बैठ चुकी है. कहानी तब अहम मोड़ लेती है, जब कोई ‘छतरी मैन’ बनकर परिमा के आरोपियों में से एक की हत्या कर देता है. क्या रावी, परिमा को इंसाफ दिला पाएगी? कौन है वो छतरी मैन, जिसने दुष्कर्मियों की हत्या की? क्या कार्तिक को भी इंसाफ मिलेगा? इन सवालों के जवाब आपको फिल्म देखकर मिलेंगे.
एक्टिंग
तापसी पन्नू वकील के किरदार में हैं और उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे वुमन ड्रिवन सिनेमा का मजबूत चेहरा क्यों मानी जाती हैं. उनके किरदार में एक खास एटिट्यूड है. वे अपनी बात मजबूती से रखती हैं और ऐसे किरदार को जीवंत करने के लिए उनके जैसी अभिनेत्री की जरूरत थी. एक सीन में जब कोर्ट के बाहर उनके चेहरे पर स्याही फेंक दी जाती है, तब भी वे उसी हालत में कोर्ट में पहुंचकर जिरह करती हैं. वह दृश्य लंबे समय तक याद रहता है.
कनी कुश्रुति ने रेप विक्टिम के दर्द को जिस तरह से अभिव्यक्त किया है, उनका चेहरा, उनकी आंखें और उनकी आवाज उस पीड़ा को महसूस करवा देती हैं. मोहम्मद जीशान अयूब ने एक रेप विक्टिम के पति के किरदार को बेहद संवेदनशीलता के साथ निभाया है. जब वे अपने बेटे को कोर्ट ले जाते हैं और कोई उनसे पूछता है कि बच्चे को कोर्ट क्यों ले आए, तो उनका जवाब होता है कि अब ये बच्चा कहां रहा, बड़ा हो गया है. उस पल आपको अहसास होता है कि वे हिंदुस्तान के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक हैं.
कुमुद मिश्रा को देखकर आप हैरान रह जाते हैं. आपने उन्हें इस रूप में पहले शायद ही देखा होगा. वे अपने किरदार से गहरा असर छोड़ते हैं, जो लंबे समय तक साथ रहता है. नसीरुद्दीन शाह हमेशा की तरह प्रभावशाली हैं. रेप के आरोपियों के वकील के किरदार में सत्यजीत शर्मा बेमिसाल हैं. उनकी अदाकारी फिल्म को एक अलग स्तर पर ले जाती है और तापसी के किरदार को और मजबूती देती है. अद्विक जायसवाल ने बेटे के किरदार में गहरी छाप छोड़ी है. रेवती जज के रोल में गरिमा जोड़ती हैं. मनोज पाहवा प्रभावशाली हैं. सीमा पाहवा ने शानदार काम किया है. सुप्रिया पाठक का काम अच्छा है. मुकेश छाबड़ा की कास्टिंग इस फिल्म की एक बड़ी ताकत है.
समाज पर सवाल
हम अक्सर कहते हैं कि रेप करने वालों को मार देना चाहिए. यह फिल्म उस पहलू पर भी गंभीरता से बात करती है. यही नहीं, फिल्म हर पहलू को संतुलित तरीके से सामने रखती है. यह सवाल करती है और एक ऐसे पेस पर चलती है, जो आपको सही लगता है. अक्सर हम बच्चों के लिए फिल्में बनाते हैं और उन्हें ए सर्टिफिकेट दे देते हैं, लेकिन यहां बच्चों को ही कोर्ट में खड़ा कर दिया गया है. यहां कोर्ट के सीन में ‘तारीख पर तारीख’ या ‘ढाई किलो का हाथ’ जैसे डायलॉग नहीं आते, लेकिन जो संवाद आते हैं, वे कहीं ज्यादा असर छोड़ते हैं. फिल्म का अंत आपको बेचैन कर देता है और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है.
राइटिंग और डायरेक्शन
अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी की राइटिंग न सिर्फ दमदार है, बल्कि बेहद संवेदनशील भी है. जो संदेश वे देना चाहते हैं, वह सीधे दर्शक तक पहुंचता है. कहानी का फ्लो लगातार आपको अपने साथ बांधे रखता है. अनुभव सिन्हा का निर्देशन प्रभावशाली है. जिस तरह से उन्होंने रॉ कैमरा एंगल का इस्तेमाल किया है, वह फिल्म के असर को कई गुना बढ़ा देता है. उन्होंने किसी एक किरदार को हीरो नहीं बनाया, बल्कि कहानी को हीरो बनाया है. हर किरदार को उसकी जरूरत के हिसाब से सीन दिए गए हैं. एक सच्चे फिल्ममेकर की तरह उन्होंने विषय के साथ ईमानदारी बरती है. कई सीन ऐसे हैं, जो सिहरन पैदा कर देते हैं और रोंगटे खड़े कर देते हैं. फिल्म में सिर्फ दुष्कर्म ही नहीं, बल्कि आज के समाज के बच्चे, घूसखोरी, सिस्टम फेलियर जैसे मुद्दों पर भी समय-समय पर तंज किया गया है.
कैसी है फिल्म
यह फिल्म आपको भीतर तक हिला देगी. आपकी रूह कांप जाएगी. रेप विक्टिम के साथ जो कुछ होता है, उसे देख पाना भी मुश्किल है, तो सोचिए उसने क्या महसूस किया होगा. फिल्म देखते समय आप अपनी सीट के कोने पर सिमट जाते हैं. आपको अपने परिवार की चिंता होने लगती है. जिस तरह से कहानी को प्रस्तुत किया गया है, वह दर्दनाक और घिनौना है. यह फिल्म किसी एक पर उंगली नहीं उठाती, बल्कि समाज का एक ऐसा चेहरा दिखाती है, जो बेहद शर्मनाक है.
फिल्म के कई संवाद आपको झकझोर देते हैं, जैसे –
- ‘फिसलने की भी एक सीमा होती है, कोई खूंटी तो लगानी चाहिए.’
- ‘स्कूल का रिजल्ट बेस्ट आ रहा था, पर पूरा स्कूल फेल हो गया.’
- ‘किसी के मरने से अच्छा लग रहा है, ये तो नहीं चाहिए था.’
- ‘अंदर सब बदल गया है और शीशे में सब एक सा दिखता है.’
- ‘तुम मर्दों को भ्रम क्यों है कि गुस्सा सिर्फ तुम्हें आता है? औरत को इतना गुस्सा आता है कि दुनिया राख हो जाए, बस हम उसे जलाती नहीं हैं.’
जब क्लास टीचर के साथ दुष्कर्म के बाद नौवीं कक्षा के बच्चे व्हाट्सएप ग्रुप में उस पर ताने कसते हैं और उनमें से एक बच्चा कहता है कि उसे भी उस दिन वहां बुलाया जाना चाहिए था, तो थिएटर में बैठे-बैठे शर्म महसूस होती है. जब स्कूल की प्रिंसिपल कहती हैं कि हमारे स्कूल का रिजल्ट बेस्ट आ रहा था, पर पूरा स्कूल फेल हो गया है, तो आप उस फेल्योर को महसूस करते हैं. रॉ कैमरा एंगल इस पूरी कहानी को और ज्यादा प्रभावशाली बना देते हैं.
कुल मिलाकर यह एक बेहद जरूरी फिल्म है, जिसे हर हाल में सबके साथ देखिए.
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