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सिनेमा और ओटीटी के दौर में रंगमंच की प्रासंगिकता : एक समग्र विश्लेषण

Theatre

रंगमंच

Theatre: भारतीय रंगमंच की परंपरा अत्यंत प्राचीन और दार्शनिक आधार पर स्थापित है। इसकी वैचारिक जड़ें नाट्यशास्त्र में मिलती हैं, जिसे भरतमुनि ने रचा। इस ग्रंथ में रंगमंच को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि लोक-शिक्षा, नैतिक बोध और सामाजिक संतुलन का माध्यम माना गया है। ‘रस’ की अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि नाटक का उद्देश्य दर्शक के भीतर भावनात्मक और बौद्धिक जागरण उत्पन्न करना है। समय के साथ यह परंपरा संस्कृत नाटकों, लोकनाट्य रूपों और आधुनिक प्रयोगधर्मी रंगमंच तक विस्तृत हुई।

किन्तु 21वीं सदी में जब सिनेमा और डिजिटल माध्यमों का अभूतपूर्व विस्तार हुआ, तब रंगमंच की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े हुए। क्या स्क्रीन आधारित मनोरंजन ने मंच की आवश्यकता को कम कर दिया है? या रंगमंच ने स्वयं को नए संदर्भों में पुनर्परिभाषित किया है? इन प्रश्नों का उत्तर सरल नहीं, बल्कि बहुआयामी है।

डिजिटल युग का प्रभाव और बदलता दर्शक व्यवहार

डिजिटल क्रांति ने कहानी कहने की शैली और दर्शकों की आदतों दोनों को बदल दिया है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स जैसे Netflix, Amazon Prime Video और Disney+ Hotstar ने सामग्री को व्यक्तिगत और ऑन-डिमांड बना दिया है। दर्शक अब अपनी सुविधा के अनुसार विषय चुन सकता है, चाहे वह राजनीतिक थ्रिलर हो, सामाजिक यथार्थ, स्त्रीवादी विमर्श या ऐतिहासिक कथा।

इस परिवर्तन ने मनोरंजन को लोकतांत्रिक बनाया है, परंतु इसके साथ दर्शक का ध्यान-काल (attention span) भी कम हुआ है। तेज़ संपादन, दृश्य प्रभाव और त्वरित कथानक ने धैर्यपूर्ण और संवादप्रधान रंगमंच के लिए चुनौती उत्पन्न की है। आर्थिक दृष्टि से भी थिएटर सीमित संसाधनों पर निर्भर रहता है, जबकि डिजिटल माध्यमों के पास व्यापक निवेश और वैश्विक पहुंच है, फिर भी यह मान लेना कि रंगमंच अप्रासंगिक हो गया है, एक अधूरा निष्कर्ष होगा।

रंगमंच की विशिष्टता : प्रत्यक्ष अनुभव की शक्ति

रंगमंच का मूल तत्व है, जीवंतता। यहां अभिनेता और दर्शक एक ही समय और स्थान में उपस्थित होते हैं। संवाद, मौन, शारीरिक भाषा और भाव, सब कुछ उसी क्षण जन्म लेते हैं और उसी क्षण समाप्त हो जाते हैं। यह क्षणभंगुरता ही उसकी शक्ति है।

सिनेमा में दृश्य संपादित और नियंत्रित होता है; ओटीटी में कहानी को बार-बार देखा जा सकता है। लेकिन रंगमंच में प्रस्तुति हर बार भिन्न होती है। अभिनेता की ऊर्जा, दर्शक की प्रतिक्रिया और मंच का वातावरण मिलकर एक अनोखा सामूहिक अनुभव निर्मित करते हैं। यही सामूहिकता सामाजिक संवाद को जन्म देती है।

रंगमंच दर्शक को निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागी बनाता है। वह केवल देखता नहीं, बल्कि महसूस करता है और कभी-कभी प्रश्न भी करता है। यही गुण उसे लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाता है।

आधुनिक मूल्यों के साथ रंगमंच का अंतर्संबंध

आधुनिक भारतीय रंगमंच ने परंपरागत संरचनाओं को चुनौती देते हुए सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और राजनीतिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को मंच पर लाया। गिरीश कर्नाड ने मिथकीय कथाओं के माध्यम से समकालीन राजनीति और नैतिक संकटों को उजागर किया। विजय तेंदुलकर ने सत्ता, हिंसा और स्त्री-शोषण पर तीखा प्रहार किया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वतंत्रता और मानव गरिमा को नाट्य-विषय बनाया।

आज रंगमंच दलित विमर्श, आदिवासी अस्मिता, पर्यावरण संकट और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे विषयों को भी मंच पर स्थान दे रहा है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि रंगमंच केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम है।

स्थानीय स्तर पर रंगमंच की भूमिका : व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक चेतना

डिजिटल व्याकुलता के इस युग में स्थानीय स्तर पर रंगमंच की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। छोटे शहरों और कस्बों में थिएटर बच्चों और युवाओं के व्यक्तित्व विकास का आधार बन रहा है। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में रंगमंच की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस राज्य की सांस्कृतिक पहचान लोकनाट्य और सामुदायिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी रही है। ऐसे परिवेश में The Faces Film and Art School, Raipur (https://facesthefilmandartschool.in) जैसे संस्थान बच्चों और युवाओं को मंच से जोड़कर एक नई सांस्कृतिक चेतना विकसित कर रहे हैं। यह संस्थान अभिनय, वाक्-शैली, शारीरिक अभिव्यक्ति और संवाद-कौशल का प्रशिक्षण देकर बच्चों में आत्मविश्वास और अनुशासन का विकास करता है। विशेष रूप से छोटे शहरों और कस्बों के बच्चों के लिए यह एक ऐसा मंच है, जहां वे अपनी प्रतिभा को पहचान पाते हैं और उसे सही दिशा दे पाते हैं।

जब बच्चे सामाजिक विषयों, जैसे शिक्षा, पर्यावरण, लैंगिक समानता या सामाजिक कुरीतियों पर आधारित नाटक प्रस्तुत करते हैं, तो वे केवल अभिनय नहीं करते, बल्कि अपने आसपास की समस्याओं को समझना और उन पर विचार करना सीखते हैं। यह प्रक्रिया उनमें नेतृत्व क्षमता, सामूहिक कार्य की भावना और सामाजिक जिम्मेदारी का विकास करती है। छत्तीसगढ़ी व अन्य स्थानीय भाषाओं में संवाद-अभ्यास उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जोड़े रखता है।

आज जब मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चों के समय और ध्यान पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं, तब ऐसे संस्थान उन्हें रचनात्मक और सकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं। रंगमंच उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्पष्ट वक्तृत्व और लोकतांत्रिक संवाद की कला सिखाता है। इस प्रकार, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में रंगमंच केवल एक कला नहीं, बल्कि जागरूक, आत्मविश्वासी और संवेदनशील नागरिक तैयार करने का सशक्त माध्यम बन रहा है।

बच्चे जब मंच पर किसी सामाजिक विषय पर नाटक प्रस्तुत करते हैं, तो वे केवल संवाद नहीं बोलते, वे समस्या को समझते हैं, उसके समाधान पर विचार करते हैं और सामूहिक कार्य का अनुभव प्राप्त करते हैं। इससे उनमें नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी का विकास होता है।

आज जब मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चों के समय और ध्यान पर प्रभुत्व जमा रहे हैं, तब ऐसे संस्थान उन्हें रचनात्मक दिशा प्रदान करते हैं। रंगमंच उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवाद की कला सिखाता है, जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए अनिवार्य है।

सहअस्तित्व का मॉडल : प्रतिस्पर्धा नहीं, परस्पर पूरकता

सिनेमा, ओटीटी और रंगमंच को प्रतिस्पर्धी माध्यमों के रूप में देखने के बजाय उन्हें पूरक माध्यमों के रूप में समझना अधिक उचित है। रंगमंच कलाकार को अभिनय की बुनियादी गहराई और अनुशासन सिखाता है। यही कलाकार आगे चलकर सिनेमा और वेब-सीरीज़ में अपनी प्रतिभा का विस्तार करते हैं। अनेक पटकथाएं और कथानक पहले मंच पर परिपक्व होते हैं, फिर डिजिटल माध्यमों तक पहुंचते हैं। इस दृष्टि से रंगमंच सृजनात्मक प्रयोगशाला है, जबकि सिनेमा और ओटीटी उसका व्यापक प्रसार।

आधुनिक समय में रंगमंच की अनिवार्यता

सिनेमा और ओटीटी ने मनोरंजन को वैश्विक और सुलभ बना दिया है, परंतु रंगमंच की जीवंतता और सामूहिकता का विकल्प अभी तक कोई माध्यम नहीं दे सका है।

रंगमंच समाज का दर्पण भी है और उसका विवेक भी। वह हमें केवल कहानी नहीं सुनाता, बल्कि सोचने, प्रश्न करने और बदलने के लिए प्रेरित करता है।

स्थानीय संस्थानों से लेकर राष्ट्रीय मंचों तक, यदि रंगमंच सामाजिक सरोकारों से जुड़ा रहेगा और नई पीढ़ी को अभिव्यक्ति का मंच देता रहेगा, तो उसकी प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं होगी।

डिजिटल युग की तेज़ रफ्तार के बीच, रंगमंच हमें ठहरकर देखने, सुनने और महसूस करने की कला सिखाता है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

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