Mrityunjay Tiwary: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव से पहले राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है. पार्टी के सीनियर नेता और लंबे समय से संगठन से जुड़े मृत्युंजय तिवारी ने आरजेडी का साथ छोड़ दिया है. उनके इस फैसले ने चुनावी माहौल में नई हलचल पैदा कर दी है. इसे तेजस्वी यादव व लालू प्रसाद यादव के लिए बड़ा नुकसान माना जा रहा है. क्योंकि तिवारी दोनों ही नेताओं के बेहद करीबी थे.
मृत्युंजय तिवारी आरजेडी के उन नेताओं में गिने जाते रहे हैं जो पार्टी का पक्ष मजबूती से रखते थे. मीडिया और राजनीतिक मंचों पर वे लगातार पार्टी की आवाज बनकर सामने आते थे. संगठन में भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती थी. ऐसे में उनका अचानक पार्टी छोड़ना आरजेडी के लिए असहज स्थिति पैदा कर गया है.
मृत्युंजय ने पार्टी छोड़ने के बाद क्या कहा?
मृत्युंजय तिवारी ने आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले 7-8 महीनों में मुझे बार-बार अपमानित करने की कोशिश की गई. मैंने कई वरिष्ठ नेताओं से शिकायत की, सभी ने आश्वासन दिया कि मामला उठाएंगे, लेकिन कुछ नहीं हुआ. आज कुल मिलाकर तेजस्वी यादव दीमकों से घिरे हुए हैं. यही वजह है कि पार्टी की हालत इस तरह हो रही है.
कहा जा रहा है कि उन्होंने पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली और संगठन में अपनी भूमिका को लेकर नाराजगी जताई है. उनका मानना था कि पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को वह महत्व नहीं मिल रहा जिसकी उन्हें उम्मीद थी. इसी असंतोष के बाद उन्होंने पार्टी से अलग होने का फैसला लिया. हालांकि आरजेडी की ओर से इस पर ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं दी गई है.
बांकीपुर में वोटिंग से पहले झटका
बांकीपुर सीट इस बार बिहार की सबसे चर्चित चुनावी सीटों में शामिल है. यहां जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर भी मैदान में हैं, जबकि भाजपा और आरजेडी दोनों अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं. ऐसे समय में मृत्युंजय तिवारी जैसे नेता का पार्टी छोड़ना आरजेडी के चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है.
सबसे ज्यादा झटका आरजेडी के लिए इस लिए माना जा रहा है क्योंकि मृत्युंजय शुरुआत से ही आरजेडी के खेमे से राजनीति करते आए हैं, इसके साथ ही उन्हें लालू यादव का बेहद करीबी माना जाता है. लालू प्रसाद यादव ने प्रवक्ता के साथ मीडिया प्रभारी के रूप में जिम्मेदारी साल 2014 में दी थी. उसी के बाद से ही आरजेडी के पक्ष अपनी बात रखते आए हैं.
किस राजनीतिक दल में जाने वाले हैं तिवारी?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भले ही एक नेता के जाने से किसी दल की पूरी रणनीति नहीं बदलती, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इस तरह का घटनाक्रम कार्यकर्ताओं के मनोबल और संगठनात्मक मजबूती पर असर डाल सकता है.
अब सभी की नजर इस बात पर है कि मृत्युंजय तिवारी आगे किस राजनीतिक दल का दामन थामते हैं या फिर किसी नई भूमिका में नजर आते हैं. हालांकि उन्होंने अपनी आने वाले राजनीतिक पारी को लेकर कुछ भी नहीं कहा है.ऐसा माना जा रहा है और राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा है कि वह अब बीजेपी का दामन थाम सकते हैं. अब देखना होगा कि वह उसी बीजेपी में जाते हैं जिसको वे कल तक पानी पी पी कर कोसते थे.
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