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2027 के लिए BJP ने शुरू की सियासी घेराबंदी, पंजाब में कैसे बदलेगा चुनावी समीकरण

PUNJAB BJP

पंजाब में चुनाव की तैयारी में जुटी बीजेपी

Punjab Election 2027: पंजाब में अगले कुछ महीनों के भीतर विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. तमाम राजनीतिक दल अपनी-अपनी तैयारियों में लगे हुए हैं. इन सब के बीच बीजेपी अपनी अलग ही रणनीति पर काम कर रही है. पार्टी अब तक शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ संभावित गठबंधन को लेकर चर्चा में रही है. लेकिन अब वह अपनी अलग राजनीतिक ताकत बढ़ाने पर भी जोर दे रही है. इसी के तहत दूसरे दलों के नेताओं से भी संपर्क बनाने की कवायद तेज हो चली है.

भारतीय जनता पार्टी ने दूसरे नेताओं को पार्टी में जगह देना शुरू कर द‍िया है. इसकी झलक 2 नवंबर को देखने को मिली. जब आम आदमी पार्टी की पहली उम्मीदवार सूची जारी होने के तुरंत बाद उसके तीन नेता भाजपा में शामिल हो गए.

बीजेपी में शामिल होने वालों में हरमीत सिंह पठानमाजरा, चेतन सिंह जौड़ामाजरा और पूर्व आईपीएस अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह के नाम शामिल हैं. पठानमाजरा और जौड़ामाजरा विधायक रह चुके हैं. जबकि कुंवर विजय प्रताप सिंह अमृतसर उत्तर से विधायक थे. उनके भाजपा में आने से पंजाब की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है.

क्या है पंजाब में बीजेपी का असली प्‍लान?

दरअसल, भाजपा की कोशिश दूसरे दलों से आने वाले नेताओं के जरिए उन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने की है, जहां उसका पारंपरिक जनाधार कमजोर रहा है. इस प्‍लान के जरिए बीजेपी आने वाले सालों के बीजेपी अपनी जमीन मजबूत कर रही है.

पार्टी को उम्मीद है कि इन नेताओं के स्थानीय संपर्क और राजनीतिक प्रभाव से उसे चुनाव में फायदा मिल सकता है. खासतौर पर किसान आंदोलन के बाद ग्रामीण पंजाब में बीजेपी के सामने भरोसा कायम करने की बड़ी चुनौती है. भरोसा कायम करने के लिए स्‍थानीय नेताओं का साथ होना बहुत जरूरी है. जो जनता से सीधे कनेक्ट कर सकें.

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अकाली दल के साथ गठबंधन पर भी नजर

बीजेपी की इस रणनीति को अकाली दल के साथ होने वाली गठबंधन की बातचीत से जोड़कर भी देखा जा रहा है. दोनों दल 2020 में कृषि कानूनों को लेकर अलग हो गए थे. अब 2027 के चुनाव से पहले दोनों के बीच फिर नजदीकियां बढ़ने की चर्चा है. कृषि कानूनों के कारण ही बीजेपी को पंजाब में खासा नुकसान हुआ है. जिसकी भरपाई अब पार्टी किसी भी हाल में करना चाहती है.

संगठन मजबूत होने से क्या बदलेगा?

भाजपा अगर पंजाब में अपना संगठन और जनाधार मजबूत कर लेती है तो गठबंधन की स्थिति में अकाली दल के सामने अधिक सीटों की मांग रख सकती है. वहीं, अकाली दल के लिए भी भाजपा के साथ दोबारा हाथ मिलाने से पहले अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाए रखना जरूरी होगा.

कुल मिलाकर भाजपा फिलहाल दो मोर्चों पर काम करती दिख रही है. एक तरफ दूसरे दलों के नेताओं को शामिल कर अपनी ताकत बढ़ाना.  दूसरी तरफ अकाली दल के साथ संभावित गठबंधन के लिए अपनी स्थिति मजबूत करना है. हालांकि, नए नेताओं के पार्टी में आने से कितना जनसमर्थन बढ़ता है, इसका फैसला चुनाव के दौरान ही होगा.

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