Tharu Tribe Culture: हिंदू कैलेंडर के मुताबिक हर साल कार्तिक महीने की अमावस्या को दिवाली का त्योहार मनाया जाता है. भारत जैसे विविधता से भरे देश में इसे मनाने के कई तरीके भी है. सामान्य तौर पर देखा जाए तो लोग इस दिन घरों में सुख-समृद्धि की देवी लक्ष्मी और शुभ के देवता गणेश की पूजा करते हैं. दीये जलते हैं, पटाखे जलते हैं, मिठाई बांटते हैं और आपस में खुशियां शेयर करके खुश होते हैं. वहीं बंगाल में मां काली की पूजा की जाती है. इन सबसे इतर उत्तराखंड की थारू जनजाति दीपावली को शोक का त्योहार मनाती है.
थारू जनजाति दिवाली को शोक का त्योहार क्यों मनाती है?
थारू जनजाति उत्तराखंड और नेपाल के तराई वाले इलाके में रहती है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में करीब 1.7 लाख और 1.5 लाख लोग नेपाल में रहते हैं. इस ट्राइब के लोग भगवान राम के स्वागत में दीये जलाने के बदले शोक मनाते हैं. इस दिन जनजाति के लोग स्वर्गवासी परिजनों को याद करते हैं. उनकी याद में एक पुतला तैयार करते हैं. ये पुतला उनके परिजनों के प्रतीक के तौर पर होता है.
पूर्वजों को याद करते हुए भोजन और शराब चढ़ाते हैं. इसे’बड़की रोटी’ प्रथा कहा जाता है. सभी एक जगह जुटते है. जहां जनजाति के लोग मिलकर पूर्वजों को याद करते हैं. ये माहौल खुशी का न होकर गमगीन हो जाता है. प्रथा को निभाने के बाद पुतले को जला दिया जाता है. इस तरह जनजाति के लिए खुशी का नहीं शोक का त्योहार बन जाता है.
महिला होती हैं मुखिया
भारत की अधिकतर जनजातियों की तरह थारू जनजाति भी महिला प्रधान है, यानी महिलाएं मुखिया की भूमिका निभाती हैं. राना, कठौलिया और डगौरा कबीलों में तो महिला ही मुखिया होती हैं. सारे कामकाज महिलाओं की देख-रेख में होते हैं. दिवाली का त्योहार भी महिलाओं की प्रतिनिधित्व में ही किया जाता है.
जनजाति के तौर तरीकों में बदलाव देखने को मिल रहा है. ट्राइब के लोग मॉडर्न जीवनशैली अपनाने की ओर बढ़ रहे हैं. जनजाति के सदस्य सामान्य तरीके से त्योहार मनाने लगे हैं.
प्रकृति की पूजा करने वाले माने जाते हैं
थारू जनजाति को प्रकृति पूजक माना जाता है. दिवाली से एक हफ्ते पहले ही त्योहार की तैयारियां शुरू कर देते हैं. घर के आंगन को गोबर से लीपा जाता है. सुंदर-सुंदर डिजाइन बनाई जाती है. कीड़े और मकोड़ों का बचाव किया जाता है. पूर्वजों के साथ-साथ पेड़-पौधों की पूजा की जाती है. जनजाति के लोगों का मानना है कि बारिश जहरीले जीव-जंतुओं का प्रभाव हो जाता है. गोबर और पीली मिट्टी के लेप से ये प्रभाव कम हो जाता है. दीये जलाए जाते हैं. नेचर को देवी और देवता मानकर पूजा करते हैं.
