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Kuno National Park: कूनो नेशनल पार्क में एक करोड़ के बकरे चट कर गए चीते, रखरखाव का खर्च 100 करोड़ पार

कूनो नेशनल पार्क

कूनो नेशनल पार्क

Bhopal News: मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में लाए गए चीतों को लेकर एक बार फिर खर्च और प्रबंधन पर सवाल खड़े हो रहे हैं. सामने आई जानकारी के अनुसार बीते एक वर्ष में चीतों ने ग्रामीण इलाकों से लगे क्षेत्र में करीब एक करोड़ रुपये से अधिक कीमत के बकरे और मवेशी शिकार किए हैं. वहीं, परियोजना के रखरखाव और प्रबंधन पर अब तक 100 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुका है.

बकरियों और छोटे मवेशियों के शिकार की घटनाएं

तीन साल पहले अफ्रीकी देशों से विशेष योजना के तहत कूनो में चीतों को बसाया गया था. वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से यह परियोजना देश के लिए ऐतिहासिक मानी गई. लेकिन अब इसके आर्थिक पहलुओं और जमीनी प्रभाव को लेकर बहस तेज हो गई है. जानकारी के मुताबिक, पार्क और आसपास के बफर जोन में चीतों की गतिविधियां बढ़ने से ग्रामीणों के पशुधन पर असर पड़ा है. कई गांवों से बकरियों और छोटे मवेशियों के शिकार की घटनाएं सामने आई हैं.

लगातार हो रहे नुकसान से उन्हें आर्थिक संकट

ग्रामीणों का कहना है कि उनकी आजीविका का मुख्य आधार पशुपालन है. ऐसे में लगातार हो रहे नुकसान से उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि वन विभाग द्वारा मुआवजा देने की प्रक्रिया लागू है, लेकिन कई मामलों में भुगतान में देरी और आंकलन को लेकर असंतोष भी जताया गया है. स्थानीय लोगों की मांग है कि मुआवजा प्रक्रिया को सरल और त्वरित बनाया जाए, ताकि नुकसान की भरपाई समय पर हो सके.

चीतों का स्वभाविक शिकार प्रवृत्ति के अनुरूप-वन विभाग

दूसरी ओर, वन विभाग का तर्क है कि चीतों का स्वभाविक शिकार प्रवृत्ति के अनुरूप है और उन्हें खुले जंगल में प्राकृतिक ढंग से रहने देना परियोजना की सफलता के लिए जरूरी है. अधिकारियों के अनुसार, चीतों की निगरानी के लिए रेडियो कॉलर, विशेष ट्रैकिंग टीम, बाड़बंदी, शिकार आधार (प्रे-बेस) विकसित करने और चिकित्सा सुविधाओं पर लगातार खर्च किया जा रहा है. यही कारण है कि रखरखाव पर कुल व्यय 100 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है.

वन्यजीव विशेषज्ञों का क्या मानना है

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी पुनर्वास परियोजना के शुरुआती वर्षों में इस तरह की चुनौतियां सामने आती हैं. उनका कहना है कि यदि शिकार प्रजातियों—जैसे हिरण और नीलगाय—की संख्या संतुलित और पर्याप्त रहे तो चीतों का ग्रामीण पशुधन की ओर रुख कम हो सकता है. इसके लिए दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रबंधन और सामुदायिक सहभागिता जरूरी है.

राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे ने तूल पकड़ा है. विपक्ष जहां खर्च और परिणामों पर सवाल उठा रहा है, वहीं सरकार इसे जैव-विविधता संरक्षण की बड़ी उपलब्धि बताकर दीर्घकालिक लाभों की बात कर रही है. सरकार का कहना है कि पर्यटन, स्थानीय रोजगार और अंतरराष्ट्रीय पहचान के रूप में भविष्य में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे.

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