एमपी के कुछ जिलों में डैकेतों के आंतक को खत्म करने के लिए आज से 45 साल पहले एक कानून बनाया गया था. ये कानून आज भी इन इलाकों में लागू है. अब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने इस कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया है. कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि क्यों न इस कानून को अब रद्द कर देना चाहिए. दरअसल बीते दिनों प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री गोविंद सिंह ने इसी को लेकर न्यायालय में पीआईएल दायर की थी.
छह जिलों के एसपी को नोटिस जारी
इसी पीआईएल पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने प्रमुख सचिव (गृह), डीजीपी और छह जिलों (ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना और श्योपुर) के एसपी को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा है. पूर्व गृह मंत्री गोविंद सिंह द्वारा दायर याचिका में एमपी डकैती और अपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम ‘दस्यु अधिनियम’ को चुनौती दी गई है. इस पीआईएल में तर्क दिया गया है कि जिन हालातों की वजह से इन जिलों में ये कानून लागू किया गया था अब वहां वैसे हालात नहीं रहे.
कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल
इतना ही इस कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल अब अब संगठित डकैती से असंबंधित मामलों में किया जा रहा है. प्रदेश में अब कोई भी सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, इस बात को सरकार भी मान चुकी है. सबसे हैरानी वाली बात तो ये है कि आम विवादों में भी इस बेहद सख्त कानून का दुरुपयोग कर 2020 से अब तक 1000 से अधिक फर्जी एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं.
दरअसल 1981 के समय चंबल क्षेत्र और सतना, पन्ना व चित्रकूट के कुछ हिस्सों के बीहड़ों और जंगलों में बड़े पैमाने पर डकैती, अपहरण और हत्याओं के बीच लागू हुआ था. इसमें कड़ी सजी और विशेष अदालतों में मुकदमे चलाने का प्रावधान है.
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