नाम नई दिल्ली… लेकिन हालात बदतर! 40 वर्षों से पानी की एक-एक बूंद के लिए जंग लड़ रहे ग्रामीण
मऊगंज में पानी की समस्या से जूझते लोग
Mauganj News: देश की राजधानी नई दिल्ली का नाम सुनते ही आधुनिक सुविधाओं, चौड़ी सड़कों, हर घर तक पानी और विकास की तस्वीर सामने आती है. लेकिन मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में भी एक गांव का नाम नई दिल्ली है, जहां तस्वीर बिल्कुल उलट है. यहां लोग आज भी 21वीं सदी में पीने के पानी के लिए रोज मौत से मुकाबला कर रहे हैं.
मऊगंज जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव के सैकड़ों परिवार पिछले करीब 40 वर्षों से पीने के पानी के लिए पहाड़ों के बीच लगभग 100 फीट गहरी खाई में उतरने को मजबूर हैं. फिसलन भरी चट्टानों के बीच बहने वाला एक छोटा सा प्राकृतिक झरना ही पूरे गांव की जीवनरेखा बना हुआ है. यही झरना इंसानों की प्यास बुझाता है, यही मवेशियों का सहारा है और रात होते ही जंगली जानवर भी इसी पानी पर निर्भर रहते हैं.
हर सुबह शुरू होती है पानी की जंग से
नई दिल्ली गांव में सुबह का पहला काम रोटी बनाना नहीं बल्कि पानी जुटाना है. महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे-छोटे बच्चे सिर पर बर्तन लेकर खाई में उतरते हैं. नीचे पहुंचने के बाद पानी भरना और फिर भारी मटकों को सिर पर रखकर खड़ी चढ़ाई चढ़ना किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं. एक छोटी सी चूक सीधे गहरी खाई में गिरा सकती है. ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से यही उनकी दिनचर्या है. गर्मी हो, बारिश हो या सर्दी हर मौसम में पानी की यह लड़ाई जारी रहती है.
एक झरना… हजारों की जिंदगी का सहारा
गांव में न तो नियमित पेयजल व्यवस्था है और न ही पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति. पूरा गांव एकमात्र प्राकृतिक झरने पर निर्भर है. यही पानी पीने, खाना बनाने, नहाने और घरेलू उपयोग में आता है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसी झरने से मवेशी भी पानी पीते हैं और जंगल से आने वाले जंगली जानवर भी अपनी प्यास बुझाते हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार के असुरक्षित जल स्रोतों से जलजनित बीमारियों का खतरा लगातार बना रहता है.
सरकारी नल लगे… लेकिन कभी पानी नहीं आया
ग्रामीण बताते हैं कि गांव में वर्षों पहले नल तो लगाए गए, लेकिन उनमें कभी पानी नहीं आया. नल-जल योजना के पाइप गांव तक नहीं पहुंचे. जल जीवन मिशन के दावों के बावजूद लोगों को आज भी प्राकृतिक झरने पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है. गांव वालों का आरोप है कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि आते हैं, वादे किए जाते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव फिर अपनी बदहाली के भरोसे छोड़ दिया जाता है.
पर्यटक देखते हैं जलप्रपात… ग्रामीण ढूंढते हैं पीने का पानी
विडंबना यह है कि नई दिल्ली गांव मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध और सबसे गहरे बहुती जलप्रपात के नजदीक स्थित है. हर वर्ष हजारों पर्यटक यहां प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने पहुंचते हैं, लेकिन उसी जलप्रपात की छाया में बसे नई दिल्ली गांव के लोग पीने की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहे हैं. जहां एक ओर पर्यटक कैमरों में झरनों की खूबसूरती कैद करते हैं, वहीं दूसरी ओर गांव की महिलाएं उसी इलाके की खतरनाक चट्टानों पर अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर पानी ढोती हैं.
बारिश में बढ़ जाती है मुसीबत
बरसात के मौसम में झरने का पानी गंदा हो जाता है. आसपास के नाले उफान पर होते हैं और मिट्टी तथा गंदगी पानी में मिल जाती है. इसके बावजूद ग्रामीणों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होता. रात के समय जंगली जानवरों का खतरा और फिसलकर दुर्घटना की आशंका अलग बनी रहती है. ग्रामीण बताते हैं कि पानी भरने के दौरान कई लोग गिरकर घायल हो चुके हैं और कई के हाथ-पैर तक टूट चुके हैं.
बीमारियों का बढ़ता खतरा
ग्रामीणों का दावा है कि पिछले तीन महीनों में गांव के 20 से अधिक लोग पेट दर्द, उल्टी और दस्त जैसी समस्याओं से पीड़ित हुए. इलाज के लिए उन्हें हनुमना, मऊगंज और नईगढ़ी तक जाना पड़ा. ग्रामीणों का मानना है कि असुरक्षित और दूषित पानी ही इन बीमारियों की सबसे बड़ी वजह है.
40 साल की गुहार… लेकिन समाधान नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों से पेयजल व्यवस्था की मांग की, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला. गांव आज भी उसी स्थिति में खड़ा है जहां दशकों पहले था.
सबसे बड़ा सवाल जब सरकार हर घर नल, हर घर जल का दावा करती है, तब मऊगंज जिले का नई दिल्ली गांव आखिर इन योजनाओं से क्यों अछूता है? क्या इस गांव तक भी कभी स्वच्छ पेयजल पहुंचेगा? क्या महिलाओं और बच्चों को 100 फीट गहरी खाई में उतरकर पानी ढोने से मुक्ति मिलेगी? या फिर नई दिल्ली नाम का यह गांव आने वाले वर्षों में भी इसी तरह प्यास, संघर्ष और सरकारी इंतजार की कहानी बना रहेगा?
ये भी पढ़ेंः कच्चे मकान से कथित करोड़ों के एमडी ड्रग्स नेटवर्क का खुलासा, मुंबई से पांचवां आरोपी गिरफ्तार
अब निगाहें प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर हैं कि क्या दशकों पुरानी इस जल समस्या का स्थायी समाधान होगा, या फिर नई दिल्ली के लोगों को आने वाली पीढ़ियों तक भी पानी के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगानी पड़ेगी