UP Politics: उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज होती नजर आ रही है. इन सब के बीच गोरखपुर में अलग ही बवाल मचा हुआ है. यहां समाजवादी पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुआ विवाद अब प्रदेशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है. कुर्सी को लेकर शुरू हुई कहासुनी के बाद पूर्व सपा जिलाध्यक्ष राम नगीना साहनी के साथ मारपीट और थप्पड़ मारने की घटना ने राजनीतिक रंग ले लिया है. संजय निषाद के मैदान में आने के बाद अब अंशुमान सिंह के समर्थन में क्षत्रिय समाज भी एक्टिव हो चली है. यही वजह है कि तमाम राजनीतिक दलों को अलग ही डर सता रहा है.
पूरा मामला 2 अक्टूबर को गोरखपुर प्रेस क्लब का है, जहां सपा की प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी. इसी दौरान बैठने की जगह को लेकर दो गुटों में बहस हो गई. विवाद इतना बढ़ा कि राम नगीना साहनी के साथ हाथापाई हुई. अंशुमान सिंह के बेटे कमलेश सिंह पर उन्हें थप्पड़ मारने का आरोप लगा है. घटना का वीडियो भी सामने आया है. दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे पर आरोप लगाए गए हैं.
विवाद बढ़ने के बाद सपा ने अंशुमान सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया. इसके साथ ही गोरखपुर की जिला और महानगर इकाइयों को भी भंग कर दिया गया. यानी पार्टी नेतृत्व ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता के तौर पर लिया.
संजय निषाद के बयान से फिर बढ़ी हलचल
मामले में निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने राम नगीना साहनी के समर्थन में आवाज उठाई है. उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से कार्रवाई की मांग की है. यह तक कह दिया कि जरूरत पड़ने पर सपा कार्यालय का घेराव भी कर सकते हैं. । इसके बाद विवाद में जातीय पहचान का मुद्दा भी प्रमुखता से उठने लगा.
दूसरी ओर, अंशुमान सिंह के समर्थन में क्षत्रिय समाज की बैठकों और विरोध की खबरों ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है. गोरखपुर की स्थानीय राजनीति में इसके असर पर चर्चा जरूर शुरू हो गई है.
क्यों अहम हैं निषाद वोट?
पूर्वांचल की राजनीति में निषाद समुदाय को एक महत्वपूर्ण सामाजिक समूह माना जाता है. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर सीट पर बीजेपी के रवि किशन को 5.85 लाख से ज्यादा वोट मिले, जबकि सपा की काजल निषाद को 4.82 लाख से अधिक वोट हासिल हुए थे. गोरखपुर ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में दोनों के बीच लोकसभा चुनाव की बढ़त करीब 3,092 वोट रही थी. इसी वजह से निषाद समाज से जुड़े मुद्दों का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है.
2027 से पहले बढ़ी हलचल
गोरखपुर की यह घटना ऐसे समय हुई है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. सपा के लिए चुनौती यह है कि विवाद उसके ही कार्यक्रम में हुआ. अब मामला सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस से जुड़ रहा है.
