Vistaar NEWS

Opinion: ट्रंप के लिये दुश्वार नहीं ‘ऑपरेशन ग्रीनलैंड’

why operation greenland is difficult for donald trump

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में डोनाल्ड ट्रंप

Opinion: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के निर्लज्ज और दुस्साहसिक अपहरण तथा अनापशनाप टैरिफ के जरिये अनेक मुल्कों की मुश्कें कसने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हौसले बुलंद हैं और वह किसी भी कीमत पर ग्रीनलैंड को हासिल करना चाहते हैं। बुधवार को स्विट्‌जरलैंड में आल्प्स की सुरम्य पहाड़ियों में स्थित दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्लूईएफ) के सम्मेलन में उन्होंने दो टूक लहजे में कहा कि अमेरिका ग्रीनलैण्ड को लेकर रहेगा, क्योंकि सिर्फ अमेरिका ही उसकी हिफाजत कर सकता है। उन्हें ग्रीनलैंड पट्टे पर नहीं चाहिये, वरन उसका अधिकार, सनद और स्वामित्व भी चाहिये।

यदि डेनमार्क ने ‘नहीं’ कहा तो वह इसे याद रखेंगे। स्पष्ट है कि ट्रंप उत्तरी गोलार्द्ध में आर्कटिक क्षेत्र में स्थित इस हिमाच्छादित अल्प-स्वायत्त डेनिश भूखंड को बज़िद हासिल करना चाहते हैं और अपना मंसूबा पूरा करने के लिये वह कोई कोर कसर नहीं उठा रखेंगे।

पूरे यूरोपीय यूनियन के आधे से अधिक साइज़ का ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा हिमानी द्वीप है। भारत उससे आकार में सिर्फ डेढ़ गुना बड़ा है, लेकिन ग्रीनलैंड की कुल आबादी 57 हजार है। देश का 80 फीसदी इलाका 30 लाख वर्ष पूर्व निर्मित बर्फ की चादर से ढंका हुआ है। देश की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी पांच नगरों में रहती है। राजधानी नुक की आबादी कारीब 20 हजार है। सिसिमियुट में 5485, इलुलिसैट की 5087, कार्कोताक की 3069 और आसियात की 2992 है। जाहिर है कि भारत के छोटे-छोटे कस्बों की आबादी भी इनसे ज्यादा है।

यहां ग्रीष्म में 24 घंटे सूर्य अस्त नहीं होता, वहीं शीत में चौबीसों घंटे सूर्योदय नहीं होता। आर्कटिक रेखा आठ देशों कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नार्वे, रूस, स्वीडन और अमेरिका (अलास्का) के हिस्सों से होकर गुजरती है। इसका उत्तरी क्षेत्र आर्कटिक कहलाता है। इस सर्कल में बर्फ का पिघलना जलवायु-परिवर्तन के मान से मानीखेज है। ग्रीनलैंड में बर्फ की चादर लगातार 29वें साल सिकुड़ी है। ग्रीनलैंड की आइसशीट प्रतिवर्ष 140 बिलियन टन हिम गंवा रही है। अनुमान है कि इससे अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिये नार्थ-वेस्ट पैसेज बनेगा।

अमेरिका की दिलचस्पी का यह एक बड़ा कारण है, दूसरे यहाँ ‘रेअर अर्थ मिनेरल्स’ का विपुल भंडार है। लौह अयस्क के अलावा यहां ग्रेफाइट, टंगस्टन, पैलेडियम, वैनेडियम, जिंक, सोना, यूरेनियम, तांबा और तेल आदि का अपार भंडार मौजूद है। यह भंडार महाशक्तियों के आकर्षण का केन्द्र है। इसी दुर्लभ खजाने के लाभ में चीन ने खुद को ‘निकट आर्कटिक राज्य’ घोषित कर दिया है, जो अमेरिका के लिये चिंता का सबब है।

जर्मनी से लगभग छह गुने बड़े ग्रीनलैंड की रक्षा का दायित्व डेनमार्क का है, जिसने उसे काफी स्वायत्तता दे रखी है। अमेरिका इसे अपने सामरिक हितों के लिये महत्वपूर्ण मानता है। करीब डेढ़ सौ साल पह‌ले सन 1867 में अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सेवर्ड ने ग्रीनलैंड के अमेरिका में विलय का मुद्दा उठाया था। दूसरे विश्व युद्ध में इसे जर्मनी के आधिपत्य से बचाने के लिये अमेरिका ने इसके सामरिक भागों पर कब्जा कर लिया था। अमेरिका फिलवक्त पश्चिमोत्तर में स्थित पिटूफिक स्पेस बेस का संचालन करता है, जो सन 1951 में अमेरिका-डेन्मार्क की संधि से अस्तित्व में आया था।

ग्रीनलैंड पर अमेरिकी धमकी की योरोप में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि न तो कोई धमकी और न ही कोई दबाव हमें प्रभावित करेगा। न उक्राइना में और न ग्रीनलैंड में और न ही कहीं और।’ यूरोपियन यूनियन (ईयू)-प्रमुख उर्सुला फॉन डेर लोयेन ने भी कहा कि योरोप अमेरिका की धमकियों के आगे नहीं झुकेगा।

डब्ल्यूईएफ की बैठक में जब कनाडा के पीएम कार्नी, जिन्होंने कनाडा को 51वाँ अमेरिकी राज्य बनाने की ट्रंप की दंभोक्ति का विरोध किया था, बोलने को खड़े हुये तो सभी उपस्थित गणमान्यों ने खड़े होकर करतलध्वनि से उनका स्वागत किया। इस गणमान्यों में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों, सीरिया के राष्ट्रपति अह‌मद अल शारा, कांगो के राष्ट्रपति फेलिक्स ट्शीसेकेडी, चीन के उपप्रधानमंत्री ही लीफेंग और उक्राइना के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलिंस्की शामिल थे।

ट्रंप के अड़ियल रवैये से नाटो में दरार का खतरा उत्पन्न हो गया है। डेनमार्क के नाटो का सदस्य होने से यदि अमेरिका ग्रीनलैंड में सैन्य कार्रवाई करता है तो नाटो- देशों के सम्मुख सांप-छछुंदर की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। नाटों के सदस्य आठ योरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में गिनेचुने सैनिक तो भेजे हैं, लेकिन आसार यहीं है कि उनकी मौजूद‌गी वहाँ झड़प का रूप लेगी। बहरहाल, इस घटनाक्रम से रूस और चीन की बांछे खिली हुई हैं, क्योंकि एक तो इससे नाटो की बिरादरी में आशंकाओं और भय को बढ़ावा मिलेगा, दूसरे उक्राइना पर रूस और ताइवान पर चीन के आधिपत्य के दावों को वैधता और ताकत मिलेगी।

ट्रंप के तल्ख तेवरों का पता इससे चलता है कि वह ग्रीनलैंड को बर्फ का छोटा, ठंडा और दुर्गम टुकड़ा बताते हुये कहते हैं कि डेन्मार्क अहसान फरामोश है। अमेरिका ने बीते दशकों में उसे जितना दिया है, उसके मुकाबले यह मांग तुच्छ है। उन्होंने कहा कि- “मैं योरोप से प्रेम करता हूँ और उसका भला चाहता हूं, लेकिन वह सही दिशा में नहीं जा रहा है।”

बहरहाल, अब सबकी निगाहें डेन्मार्क के विदेशमंत्री लार्स लोके रासमुसेन की अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस और विदेशमंत्री रूबियो से वाशिंगटन में प्रस्तावित वार्ता पर हैं, लेकिन ट्रंप की ज़िद और सनक के चलते कोई नतीजा निकलने की संभावना नगण्य है। इस बीच अलास्का की सीनेटर लिसा मुर्कोव्स्की ने न्यू हैंपशायर की डेमाक्रेट-साथी जीन शाहीन के साथ सीनेट में एक बिल पेश किया है, जिसका मकसद किसी दूसरे नाटो सदस्य के इलाके पर एकतरफा कब्जे पर रोक लगाना है।

Exit mobile version