CG High Court: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने औद्योगिक हेम्प (कैनाबिस) भांग की खेती की अनुमति से जुड़े मामले में दायर रिट अपील को खारिज कर दिया है. न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि पहले ही समान विषय पर याचिका खारिज हो चुकी है, ऐसे में उसी मुद्दे को दोबारा उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. अपीलकर्ता डॉ. सचिन अशोक काले ने एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी थी.
क्या है पूरा मामला?
डॉ. सचिन अशोक काले ने वर्ष 2025 में हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी. इसमें उन्होंने राज्य सरकार से यह निर्देश देने की मांग की थी कि उनके द्वारा 22 फरवरी 2024 को दी गई उस अभ्यावेदन पर निर्णय लिया जाए, जिसमें उन्होंने एनडीपीएस एक्ट1985 के प्रावधानों के अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य में औद्योगिक हेम्प/कैनाबिस की खेती और इको-सिस्टम विकसित करने की अनुमति मांगी थी. हालांकि, 12 सितंबर 2025 को एकल पीठ ने यह याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ यह रिट अपील दायर की गई.
अपीलकर्ता ने क्या दलील दी?
डॉ. काले ने स्वयं न्यायालय में उपस्थित होकर दलील दी कि उन्होंने सीधे खेती की अनुमति नहीं मांगी थी, बल्कि केवल यह आग्रह किया था कि उनकी अभ्यावेदन पर कानून के अनुसार समयबद्ध निर्णय लिया जाए. एनडीपीएस एक्ट 1985 के तहत राज्य सरकार को औद्योगिक और वैज्ञानिक प्रयोजनों के लिए कैनाबिस की खेती को विनियमित करने का अधिकार है. राज्य सरकार द्वारा निर्णय न लेना प्रशासनिक मनमानी है. यह गतिविधि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत व्यापार करने के मौलिक अधिकार से भी जुड़ी है.
राज्य सरकार की तरफ से क्या कहा गया?
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि डॉ. काले पहले ही इसी विषय पर डब्ल्यूपीपीआईएल के जरिए डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटा चुके हैं. उस जनहित याचिका को 7 जुलाई 2025 को खारिज किया जा चुका है. अब उसी मुद्दे को अभ्यावेदन पर विचार के नाम पर दोबारा उठाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है. कैनाबिस की खेती अत्यंत नियंत्रित विषय है और इस पर किसी व्यक्ति का कोई वैधानिक अधिकार स्वतः उत्पन्न नहीं होता, जब तक कानून किसी स्पष्ट कर्तव्य का निर्धारण न करे, तब तक मैंडेमस (निर्देश) जारी नहीं किया जा सकता.
हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि अपीलकर्ता द्वारा उठाया गया मुद्दा पहले ही समान रूप से खारिज हो चुका है. एक ही विषय को अलग-अलग रूप में बार-बार उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. अपीलकर्ता कोई ऐसा प्रवर्तनीय वैधानिक अधिकार नहीं दिखा सके, जिसके आधार पर अदालत हस्तक्षेप करे.
यह विषय नीति और कानून से जुड़ा है, जिसमें न्यायालय सीमित दायरे में ही दखल दे सकता है. हाई कोर्ट ने रिट अपील को खारिज कर दिया और कहा कि, एकल पीठ के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है, इसलिए हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता. मामले में कोई लागत भी नहीं लगाई गई है.
