इनपुट-वीरेंद्र यादव
Ground Report from Kanker: शिक्षक दिवस के मौके पर जब पूरा देश अपने गुरुओं के योगदान और समर्पण को याद कर रहा है, वहीं कांकेर जिले के अंदरूनी इलाकों से शिक्षकों के संघर्ष और समर्पण की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देती है. यहां शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के लिए हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंच रहे हैं.
नदी पार कर स्कूल पहुंच रहे शिक्षक
कांकेर जिले के अंदरूनी इलाके नदी-नालों, पहाड़ों और घने जंगलों से घिरे हुए हैं. कई क्षेत्रों में आज भी पुल और पक्की सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. इसी मुश्किल परिस्थिति के बीच शिक्षक आदिवासी अंचल के बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का जिम्मा निभा रहे हैं.
मामला उत्तर बस्तर कांकेर जिले के ग्राम संगम के बारकोट इलाके का है. यहां बहने वाली मेढकी नदी पर पुल नहीं होने के कारण नदी के उस पार बसे बारकोट, हिदुर और खेड़ेगांव के लोगों को नाव के सहारे आवागमन करना पड़ता है. यहां करीब पांच शिक्षक रोजाना इसी नाव के सहारे नदी पार कर स्कूल पहुंचते हैं.
बिना लाइफ जैकेट के जोखिम भरा सफर
खास बात यह है कि नदी पार करने के दौरान शिक्षकों के पास लाइफ जैकेट तक उपलब्ध नहीं है. तेज बहाव वाली नदी में शिक्षक खुद चप्पू चलाकर नाव को एक किनारे से दूसरे किनारे तक ले जाते हैं. ऐसे में जरा सी चूक बड़ा हादसा बन सकती है.
शिक्षकों और ग्रामीणों की इस समस्या को करीब से समझने के लिए Vistar News की टीम भी मौके पर पहुंची. टीम ने खुद नाव में सवार होकर मेढकी नदी को पार किया और नदी के दूसरी ओर पहुंचकर शिक्षकों एवं ग्रामीणों से बातचीत की. इस दौरान सामने आया कि जिन परिस्थितियों को शिक्षक और ग्रामीण हर दिन झेलते हैं, वह बेहद चुनौतीपूर्ण हैं.
20 साल से जंगल-कीचड़ के बीच पहुंच रहे शिक्षक
नदी पार करने के बाद भी शिक्षकों का सफर खत्म नहीं होता. इसके बाद उन्हें जंगल और कच्चे रास्तों से होकर कई किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है. किसी शिक्षक को करीब एक किलोमीटर तो किसी को छह किलोमीटर तक पैदल सफर तय करना पड़ता है. बारिश के दिनों में रास्ते कीचड़ और फिसलन से भर जाते हैं, इसके बावजूद शिक्षक नियमित रूप से स्कूल पहुंचने की कोशिश करते हैं.
शिक्षकों ने बताया कि उन्हें नदी पार करते समय डर तो लगता है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई को देखते हुए वे अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते. कुछ शिक्षक पिछले 20 वर्षों से भी अधिक समय से इस क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
पलट गई थी नाव, तैरकर बची जान
एक शिक्षक ने बताया कि एक बार नदी के तेज बहाव में नाव पलट गई थी. उस दौरान उन्होंने तैरकर किसी तरह अपनी जान बचाई. ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर आवागमन के लिए नाव तैयार की है और वर्तमान में यही नाव शिक्षकों और ग्रामीणों के आने-जाने का प्रमुख सहारा बनी हुई है.
ग्रामीणों और शिक्षकों की सबसे बड़ी मांग नदी पर पुल निर्माण की है. उनका कहना है कि पुल बन जाने से न केवल शिक्षकों का आवागमन आसान होगा, बल्कि ग्रामीणों को भी बड़ी राहत मिलेगी. खासकर बारिश के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ने पर होने वाली परेशानी और खतरा काफी कम हो जाएगा.
कलेक्टर ने शिक्षक के समर्पण को सराहा
बताया जा रहा है कि कांकेर जिले के अलग-अलग दुर्गम इलाकों में करीब 32 शिक्षक ऐसे हैं, जिन्हें स्कूल पहुंचने के लिए नदी-नालों और दुर्गम रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है. वहीं प्रशासन की ओर से भी शिक्षकों के इस समर्पण को सराहनीय बताया गया है. कलेक्टर ने शिक्षकों के शिक्षा के प्रति समर्पण को सलाम करते हुए ग्रामीणों और शिक्षकों की समस्या के समाधान के लिए आवश्यक प्रयास करने की बात कही है.
गुरु के समर्पण की मिसाल
शिक्षक दिवस के मौके पर कांकेर से सामने आई यह तस्वीर बताती है कि शिक्षक केवल कक्षा में खड़े होकर बच्चों को पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि कई बार वह खुद संघर्षों से गुजरकर बच्चों के भविष्य की नींव मजबूत करता है. तेज बहाव वाली नदी, बिना लाइफ जैकेट का सफर और फिर कई किलोमीटर की पैदल यात्रा के बावजूद बच्चों को पढ़ाने का यह जज्बा निश्चित रूप से गुरु के समर्पण की मिसाल है.
