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Dussehra 2026 Special: पातालेश्वर महादेव को सबसे पहले चढ़ता है सोनपत्र… फिर रंजिश भूलकर 50 गांवों के लोग मिलते है गले

Unique Tradition in Malhar: 50 Villages Exchange Shami Leaves to Forget Rivalries After Ravan Dahan

Dussehra 2026 Special: बिलासपुर/मल्हार. छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक गढ़ मल्हार में दशहरा केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व नहीं, बल्कि आपसी बैर-भाव भुलाकर भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश देने वाला उत्सव भी है. यहां रावण दहन के बाद शमी वृक्ष की पत्तियों यानी सोनपत्र का आदान-प्रदान कर लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं. करीब 75 साल से चली आ रही इस परंपरा में मल्हार सहित आसपास के लगभग 50 गांवों के लोग शामिल होते हैं. इस दौरान पुरानी रंजिश भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाने की परंपरा मल्हार के दशहरे को विशिष्ट पहचान देती है. (Malhar Pataleshwar Mahadev Dussehra Tradition)

सबसे पहले पातालेश्वर महादेव को अर्पित होता है सोनपत्र

मल्हार के दशहरे की प्रमुख विशेषता इसकी धार्मिक परंपरा है. गढ़ के जंगल से बैगा परिवार के सदस्य खैया तट के पास स्थित शमी वृक्ष की डगाल लेकर आते हैं. रावण दहन और आतिशबाजी के बाद सोनपत्र का पूजन किया जाता है. इसके बाद भगवान राम, लक्ष्मण और हनुमान की भूमिका निभाने वाले पात्रों के साथ सोनपत्र सबसे पहले भगवान पातालेश्वर महादेव को अर्पित किया जाता है. इसके बाद नगर की सुरक्षा, लोगों के अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना की जाती है. धार्मिक आस्था से जुड़ी इस रस्म के बाद सोनपत्र बांटने और गले मिलने का सिलसिला शुरू होता है. (Malhar Pataleshwar Mahadev Dussehra Tradition)

नरियरा के बढ़ई ने बनाया था पहला रावण

मल्हार में दशहरा उत्सव की शुरुआत की कहानी भी दिलचस्प है. वरिष्ठ नागरिकों के अनुसार, वर्ष 1950 में बिलासपुर नगर निगम के तत्कालीन उपाध्यक्ष पंडित मनराखनलाल पांडेय ने नरियरा गांव के एक कुशल बढ़ई को बुलाकर बाड़ा में रावण का पुतला बनवाने की शुरुआत की थी. कारीगरों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था भी उनके घर पर की जाती थी. शुरुआती दौर में सीमित स्तर पर शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे जनभागीदारी से जुड़ता गया. समय के साथ यह परंपरा मल्हार की सांस्कृतिक पहचान बन गई और इसमें आसपास के गांवों की भागीदारी भी बढ़ती गई.

सोनपत्र देकर गले मिल भूल जाते हैं पुरानी रंजिश

दशहरे के दिन मल्हार के मेला चौक में आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं. एक दिवसीय मेले में खरीदारी के साथ मेल-मिलाप का उत्साह भी देखने को मिलता है. रावण दहन के बाद लोग एक-दूसरे को सोनपत्र देकर गले मिलते हैं और विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हैं. बुजुर्गों से आशीर्वाद लेने के साथ पुराने मतभेद भुलाकर रिश्तों को मजबूत करने की यह परंपरा सामाजिक जीवन में नई ऊर्जा भरती है. यहां सोनपत्र देना केवल पर्व की औपचारिकता नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और सद्भाव का प्रतीक माना जाता है.

मुस्लिम परिवार भी निभाते हैं भाईचारे की परंपरा

मल्हार के दशहरे की खासियत धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण भी है. स्थानीय मुस्लिम परिवार और ग्राम जुनवानी के लोग भी आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. पुलिस कल्याण पेट्रोल पंप के प्रभारी उपनिरीक्षक ओंकारधर दीवान के अनुसार, मुस्लिम परिवार हिंदू भाइयों को शमीपत्र देकर उनका स्वागत करते हैं और अपने घरों में दही-बड़ा खिलाते हैं. विभिन्न समुदायों की यह भागीदारी पर्व के संदेश को और व्यापक बनाती है. (Malhar Pataleshwar Mahadev Dussehra Tradition)

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