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रेल यात्रियों के लिए खुशखबरी! बिलासपुर जोन की 26 ट्रेनों में लगे LHB कोच, अब सुरक्षित और आरामदायक होगी यात्रा

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CG News: दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर जोन की 26 ट्रेनों में पुराने आईसीएफ कोचों की जगह आधुनिक एलएचबी कोच लगाए गए हैं. रेलवे के मुताबिक, इससे यात्रियों को अधिक बर्थ के साथ बेहतर सुरक्षा, आराम और सुविधाएं मिलेंगी. अब तक जोन की 26 ट्रेनों के 34 रैक को एलएचबी कोच में बदला जा चुका है.

चरणबद्ध तरीके से बदले जा रहे पुराने कोच

रेल प्रशासन ट्रेनों में आईसीएफ यानी इंटीग्रल कोच फैक्ट्री के पुराने कोचों को हटाकर लिंक हॉफमैन बुश यानी एलएचबी कोच लगाने का काम चरणबद्ध तरीके से कर रहा है. इन कोचों को आधुनिक तकनीक और मजबूत ढांचे के साथ तैयार किया गया है. सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इनकी डिजाइन में कई बदलाव किए गए हैं.

बेहतर सस्पेंशन से सफर होगा आरामदायक

एलएचबी कोच में बेहतर सस्पेंशन सिस्टम लगाया गया है, जिससे ट्रेन के चलने के दौरान झटके और कंपन कम महसूस होते हैं. इससे यात्रियों का सफर पहले के मुकाबले अधिक आरामदायक हो जाता है. कोच की बेहतर बनावट और स्थिरता के कारण ट्रेनों को अधिक गति से चलाने में भी मदद मिलती है.

इन ट्रेनों में लगाए गए एलएचबी कोच

एलएचबी कोच से लैस की गई ट्रेनों में बिलासपुर-भगत की कोठी, बिलासपुर-बीकानेर, बिलासपुर-बक्सर, बिलासपुर-एर्णाकुलम, बिलासपुर-चेन्नई, बिलासपुर-पुणे, रायपुर-कोरबा, बिलासपुर-अमृतसर छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस, दुर्ग-निजामुद्दीन संपर्कक्रांति, दुर्ग-जम्मूतवी, दुर्ग-नौतनवा, दुर्ग-कानपुर, दुर्ग-अजमेर, दुर्ग-ऊधमपुर, दुर्ग-निजामुद्दीन हमसफर और दुर्ग-भोपाल अमरकंटक एक्सप्रेस शामिल हैं.

कई अन्य ट्रेनों को भी किया गया अपग्रेड

इसके अलावा रायगढ़-गोंदिया जनशताब्दी, कोरबा-इतवारी शिवनाथ एक्सप्रेस, बिलासपुर-नागपुर इंटरसिटी, बिलासपुर-रीवा, बिलासपुर-इंदौर नर्मदा एक्सप्रेस, बिलासपुर-येलहंका, दुर्ग-अंबिकापुर और अंबिकापुर-शहडोल ट्रेनें भी एलएचबी कोच से संचालित हो रही हैं.

पुराने कोच की तुलना में ज्यादा बर्थ

सामान्य आईसीएफ स्लीपर कोच में 72 बर्थ होती हैं, जबकि एलएचबी स्लीपर कोच में यह संख्या बढ़कर 80 हो जाती है. इसी तरह आईसीएफ एसी-3 में 64 की जगह एलएचबी एसी-3 कोच में 72 बर्थ मिलती हैं. एसी-2 में भी बर्थ की संख्या 46 से बढ़कर 62 हो जाती है.

1999 में रेलवे में शामिल हुए थे एलएचबी कोच

एलएचबी कोच का नाम जर्मनी की कंपनी लिंक हॉफमैन बुश के नाम पर पड़ा है. भारतीय रेलवे ने वर्ष 1999 में इन कोचों को अपनाना शुरू किया था. वर्तमान में इनका निर्माण कपूरथला स्थित रेलवे कोच फैक्ट्री में किया जाता है. आधुनिक डिजाइन, मजबूत ढांचे, बेहतर सस्पेंशन और अधिक जगह के कारण रेलवे में इन कोचों का इस्तेमाल लगातार बढ़ाया जा रहा है.

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