Raipur Devi Temples: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सिर्फ अपने डेवलपमेंट को लेकर फेमस नहीं है बल्कि राजधानी रायपुर को देवी मंदिरों का गढ़ भी कहा जाता है. यहां का जाना माना इलाका पुरानी बस्ती क्षेत्र, मंदिरों का गढ़ कहा जाता है. ये सभी मंदिर 150 सौ साल से ज्यादा पुराने हैं. महज दो किलोमीटर की दूरी में पांच मंदिरों में हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं. वहीं, हर मंदिर का अपना-अपना ऐतिहासिक महत्तव है. और अलग कहानी भी है.
- मां महामाया देवी मंदिर, पुरानी बस्ती
राजधानी रायपुर की पहचान जिस मंदिर से सबसे ज्यादा जुड़ी है, वो है पुरानी बस्ती का महामाया मंदिर. स्थानीय मान्यता के अनुसार इसकी उम्र 5000 साल से भी ज्यादा बताई जाती है. पूरी कहानी राजा मोरध्वज की है, जो अपनी रानी कुमुददेवी के साथ नदी के किनारे घूम रहे थे. नदी में उन्हें एक काला पत्थर दिखा, जिसके ऊपर नाग फन फैलाए बैठा था. राजा ने उसे निकलवाया तो आकाशवाणी हुई. और कहा मुझे कंधे पर उठाकर ले चलो. राजा प्रतिमा को कंधे पर लेकर चल पड़े, लेकिन एक जगह थक कर उन्होंने उसे नीचे रख दिया. इसके बाद लाख कोशिशों के बाद भी वो प्रतिमा वहां से हिली नहीं. उसी जगह मां को स्थापित कर दिया गया. आज वही जगह महामाया देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है.
- मां दंतेश्वरी मंदिर, कुशालपुर चौक
रायपुर के कुशालपुर चौक पर स्थित मां दंतेश्वरी का यह मंदिर करीब 200 साल पुराना है, लेकिन इसकी सबसे अलग और खास बात इसकी पूजा की परंपरा है. आमतौर पर देवी मंदिरों में ब्राह्मण पूजा करते हैं, लेकिन यहां यादव समाज के लोग पूजा-अर्चना करते हैं. कहा जाता है कि कभी यह पूरा इलाका घना जंगल था. यादव समाज के लोग यहां गाय चराने आते थे. एक दिन ग्वालिन गणेशिया बाई ने देखा कि एक गाय एक पत्थर पर खड़ी है और उसके थन से अपने आप दूध पत्थर पर गिर रहा है. उन्होंने गांव वालों को बताया. जब देखा गया तो वो पत्थर देवी की प्रतिमा थी. इसके बाद वहीं छोटा सा मंदिर बनाकर प्राण प्रतिष्ठा की गई और तब से लेकर आज तक यादव परिवार ही यहां की पूजा संभाल रहा है.
- कंकाली मठ, ब्राह्मण पारा
वहीं, पुरानी बस्ती से सटे ब्राह्मणपारा में एक कंकाली मठ है, जिसे करीब 600 साल पहले नागा साधुओं ने स्थापित किया था. बताया जाता है कि, उस समय यह पूरा इलाका श्मशान घाट हुआ करता था. कंकालों के बीच देवी प्रतिमा स्थापित होने के कारण इसका नाम कंकाली पड़ा. बाद में मठ की प्रतिमा को थोड़ी दूर पर मंदिर बनाकर स्थापित किया गया. इस मठ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह साल भर बंद रहता है. सिर्फ दशहरे के दिन इसके पट खोले जाते हैं और पूजा होती है. अंदर प्राचीन अस्त्र-शस्त्र रखे हुए हैं, जो नागा साधुओं के समय के बताए जाते हैं. मंदिर के सामने एक तालाब है, जहां दशहरे पर घर-घर में बोए गए जंवारा ज्योत का विसर्जन किया जाता है.
- शीतला माता मंदिर, पुरानी बस्ती
वहीं, पुरानी बस्ती में एक और प्राचीन मंदिर है. यहां के अमीनपारा थाना के पास एक शीतला मंदिर है. बताया जाता है कि, यह मंदिर करीब 250 साल पुराना है. इस मंदिर में प्रतिमा की पूजा नहीं, बल्कि पत्थर रूपी पिंड की पूजा की जाती है. माना जाता है कि यह पिंड जमीन से खुद प्रकट हुआ था, तब से उसी रूप में इसकी पूजा हो रही है. यहां माता को ठंडा भोजन और मिठाई का भोग लगाया जाता है. खास बात यह है कि बरसों से एक ही परिवार इस मंदिर की पूजा की परंपरा निभा रहा है.
