छत्तीसगढ़ में ‘बंधा मतौर’ की अनोखी परंपरा, जहां ढोल-नगाड़ों की थाप पर उछलती हैं मछलियां

CG News: बस्तर संभाग के ग्रामीण अंचलों की संस्कृति और अनूठी परंपराएं पूरे देशभर में अपनी अलग पहचान रखती हैं. कोंडागांव जिले का ग्राम बरकई भी अपनी ऐसी ही एक अनोखी परंपरा 'बंधा मतौर' को लेकर चर्चा में है.
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नीरज उपाध्याय (केशकाल)

CG News: बस्तर संभाग के ग्रामीण अंचलों की संस्कृति और अनूठी परंपराएं पूरे देशभर में अपनी अलग पहचान रखती हैं. कोंडागांव जिले का ग्राम बरकई भी अपनी ऐसी ही एक अनोखी परंपरा ‘बंधा मतौर’ को लेकर चर्चा में है. हर तीन साल में आयोजित होने वाले इस आयोजन में हजारों ग्रामीण एक साथ तालाब में उतरकर मछली पकड़ते हैं. खास बात यह है कि पूजा-अर्चना के बाद जैसे ही ढोल-नगाड़ों की थाप गूंजती है, तालाब की मछलियां पानी में उछलने लगती हैं और फिर शुरू होता है सामूहिक मछली पकड़ने का रोमांच. “बंधा मतौर” आज भी बस्तर की जीवंत लोकसंस्कृति, परंपरा और ग्रामीण एकता की अनूठी मिसाल बना हुआ है.

‘बंधा मतौर’ की अनोखी परंपरा

दरअसल, दशकों पहले ग्राम बरकई के तत्कालीन मालगुजारों ने ग्रामीणों के श्रमदान से इस विशाल तालाब का निर्माण करवाया था. तालाब बनने के बाद मालगुजारों ने यह परंपरा शुरू की कि हर तीन वर्ष में एक बार तालाब की सभी मछलियां गांववासियों और यहां पहुंचने वाले लोगों के लिए छोड़ दी जाएंगी. तभी से “बंधा मतौर” की यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है. आयोजन में शामिल होकर तालाब में मछली पकड़ने के लिए लोगों को 200 रुपये शुल्क भी जमा करना पड़ता है. तय समय आने पर हजारों ग्रामीण एक साथ तालाब में उतरते हैं और पारंपरिक तरीके से मछली पकड़ते हैं.

ढोल-नगाड़ों की थाप पर उछलती हैं मछलियां

कार्यक्रम की शुरुआत गांव के मालगुजार, पुजारी और पटेल द्वारा ग्राम देवी की पूजा-अर्चना से की जाती है. इसके बाद ढोल-नगाड़ों की गूंज पूरे माहौल को उत्साह से भर देती है. ग्रामीणों के मुताबिक ढोल की थाप सुनकर तालाब की मछलियां पानी में उछलने लगती हैं, जो इस आयोजन का सबसे खास आकर्षण माना जाता है. इसके बाद ग्रामीण जाल और पारंपरिक उपकरणों के साथ तालाब में उतरते हैं और मछली पकड़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि बरकई बस्तर का एकमात्र ऐसा गांव है, जहां “बंधा मतौर” की यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवंत है.

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इस बार आयोजन को देखने और इसमें शामिल होने के लिए कोंडागांव समेत आसपास के कई जिलों से रिकॉर्ड संख्या में लोग पहुंचे. बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने तालाब में उतरकर मछलियां पकड़ीं और अपने घर लेकर गए. आयोजन समिति का कहना है कि हर साल इस कार्यक्रम की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है, इसलिए आने वाले वर्षों में इसे और अधिक भव्य रूप देने की तैयारी की जाएगी. वहीं कार्यक्रम के समापन पर गांव के मालगुजार द्वारा तालाब के पानी को स्पर्श कर “बंधा मतौर” समाप्त होने की घोषणा की जाती है, जिसे इस पारंपरिक आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है.

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