पहले BJP में शामिल होने का ऐलान, अब इनकार… बिहार में दो MLC के कारण क्यों मचा सियासी घमासान
इस तस्वीर के बाद मचा घमासान
Bihar Politics: बिहार की राजनीति इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है. हालांकि इस समय दो निर्दलीय विधान परिषद सदस्यों के बीजेपी में शामिल होने को लेकर घमासान मचा हुआ है. इन सदस्यों ने पहले बीजेपी में शामिल होने की बात कही थी. हालांकि ये दोनों बाद में अपने बयान से पलट गए. इन्हीं के बयानों से शुरू हुआ विवाद अब तूल पकड़ता जा रहा है.
तिरहुत स्नातक सीट से जीते बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के एमएलसी डॉ. राहुल राज की तरफ से दावा किया गया था कि वह बीजेपी में शामिल हो गए हैं. हालांकि, दल बदल कानून को लेकर सवाल उठने के बाद दोनों ने सफाई दी. अब कहा कि उन्होंने बीजेपी की सदस्यता नहीं ली है. बल्कि बीजेपी को केवल समर्थन दिया है. जिसके बाद आरजेडी ने दोनों की सदस्यता खत्म करने की मांग की है.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, दोनों निर्दलीय एमएलसी हाल ही में बीजेपी के एक कार्यक्रम में पहुंचे थे. इस दौरान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और बिहार बीजेपी प्रभारी हरीश द्विवेदी भी मौजूद थे. कार्यक्रम के बाद मीडिया से बातचीत में दोनों नेताओं ने बीजेपी में शामिल होने की बात कही. उनके इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में हलचल मच गई.
मामला दलबदल कानून तक पहुंचा तो दोनों नेताओं ने सोशल मीडिया के जरिए अपना रुख स्पष्ट किया. पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल होने की बात से इनकार कर दिया. इसी बयान के बाद अब सियासी घमासान मचा हुआ है.
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने इसको लेकर क्या कहा?
विवाद बढ़ने पर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी सफाई दी है. उन्होंने कहा कि दोनों एमएलसी ने बीजेपी को समर्थन दिया है, न कि पार्टी की सदस्यता ली है. हालांकि, शुरुआती बयान और बाद में दी गई सफाई के बीच अंतर को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है.
तेजस्वी और मनोज झा ने उठाया संविधान का मुद्दा
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने संविधान की दसवीं अनुसूची का हवाला देते हुए दोनों एमएलसी की सदस्यता रद्द करने की मांग की है. वहीं, आरजेडी सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बीजेपी पर संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करने का आरोप लगाया.
मनोज झा का कहना है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने वाला कोई सदस्य बाद में किसी राजनीतिक दल की सदस्यता नहीं ले सकता. ऐसा करने पर उसकी विधायी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है.
क्या कहता है दल बदल कानून?
संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(2) के अनुसार, निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने वाले सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है. हालांकि, किसी दल को समर्थन देना और उसकी औपचारिक सदस्यता लेना अलग-अलग बातें हैं. इस मामले में दोनों नेताओं ने पार्टी में शामिल होने से इनकार किया है. ऐसे में उनके बयानों और गतिविधियों की जांच अहम होगी. अंतिम फैसला विधान परिषद के सभापति को लेना है.
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