Vistaar NEWS

’डॉलर’ की रंगबाजी दूर कर सकता है BRICS? लोकल करेंसी में कारोबार दिलाएगा अमेरिकी दबदबे से छुटकारा

BRICS

BRICS समिट के दौरान पीएम मोदी और पुतिन

BRICS 2026: क्या दुनिया धीरे-धीरे डॉलर से अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रही है? नई दिल्ली में चल रही 18वीं BRICS शिखर बैठक के बीच यह सवाल एक बार फिर वैश्विक आर्थिक बहस के केंद्र में है. खास तौर पर भारत, रूस, चीन और ईरान जिस तरह स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर जोर दे रहे हैं, उसने अमेरिकी डॉलर की वैश्विक बादशाहत को लेकर बहस तेज कर दी है. दुनिया भर के अधिकांश कूटनीतिज्ञ और विदेश नीति के जानकार ब्रिक्स को बदलते ‘वर्ल्ड ऑर्डर’ का ट्रेलर मान रहे हैं. यह पहली बार है जब ब्रिक्स के मंच से रूस और ईरान ने खुले तौर पर अमेरिकी करेंसी की एकछत्र राज को चुनौती देने का आह्वान किया है. भारत ने भी ब्रिक्स की प्रासंगिकता और दुनिया में इसके इकॉनमी की साइज से इस मंच के विरोधियों को आईना दिखाया है.

12 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS नेताओं की बैठक शुरू हुई. इससे एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से मुलाकात की. ब्रिक्स बिजनेस फोरम में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान व्यवस्था और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठा. ब्रिक्स के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक प्रमुखों ने भी सीमा-पार भुगतान को तेज, सस्ता, सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के साथ लोकल करेंसी में बिजनेस और इनवेस्टमेंट को बढ़ावा देने पर सहमति जताई है. ईरान के राष्ट्रपति पेजश्कियन ने तो खुले तौर पर लोकल करेंसी में व्यापार करने का आह्वान किया.

लोकल करेंसी में व्यापार आखिर है क्या?

अब आप समझ लीजिए कि लोकल करेंसी में व्यापार का मतलब क्या है. चूंकि, दुनिया भर में अमेरिकी डॉलर के ज़रिए अधिकांश व्यापार होते हैं. लोकल करेंसी में व्यापार का सीधा अर्थ है कि दो देशों के बीच होने वाले कारोबार में हर बार डॉलर को मध्यस्थ मुद्रा बनाने की जरूरत न पड़े. मसलन भारत रूस से तेल खरीदता है तो भुगतान रुपये और रूबल में किया जा सकता है. इसी तरह चीन और रूस युआन-रूबल में तथा दूसरे BRICS देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ा सकते हैं.

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्रिक्स ने डॉलर की जगह कोई नई साझा मुद्रा बना ली है. फिलहाल तो ब्रिक्स राष्ट्रों के पास यूरोपीय यूनियन जैसी कोई एक करेंसी नहीं है. और जिस तरह से कुछ देशों के आपसी कॉन्फ़्लिक्ट है, वैसे में यह संभव भी नजर नहीं आता. लेकिन, विकल्प के तौर पर अपनी-अपनी करेंसी में व्यापार की छूट एक बड़ा माध्यम बताया जा रहा है. कुल मिलाकर यहां असल कोशिश वैकल्पिक पेमेंट आर्किटेक्चर बनाने की है. यानी ऐसी व्यवस्था जिसमें देशों को अपने व्यापार के लिए हर बार डॉलर आधारित बैंकिंग नेटवर्क पर निर्भर न रहना पड़े.

भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 11 सितंबर को BRICS बिजनेस फोरम में सदस्य और पार्टनर देशों के पेमेंट सिस्टम को जोड़ने तथा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की वकालत की. उन्होंने भारत के UPI जैसे डिजिटल भुगतान ढांचे को सीमा-पार सहयोग के लिए इस्तेमाल करने की संभावना भी बताई.

भारत-रूस पहले से कर रहे हैं प्रयोग

लोकल करेंसी में व्यापार की सबसे बड़ी प्रयोगशाला भारत और रूस का रिश्ता है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने डॉलर और यूरो आधारित भुगतान व्यवस्था को मुश्किल बनाया. इसके बाद दोनों देशों ने राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ाने की कोशिश की. आज की तारीख में रूस के साथ भारत का व्यापार इसका बड़ा उदाहरण है. रूस भारत का बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बन चुका है, जबकि भारत रूस को दवाइयां, इंजीनियरिंग सामान और दूसरी वस्तुएं निर्यात करता है. भारत-रूस व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं के इस्तेमाल से डॉलर आधारित भुगतान की जरूरत कुछ हद तक कम हुई है. अब दोनों देश अब सीमा-पार डिजिटल मुद्रा और भुगतान तंत्र पर भी काम करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं.

लेकिन यहां एक बड़ी समस्या व्यापार घाटे की आ जाती है. अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो ट्रेड बैलेंस गड़बड़ा जाता है. अगर भारत रूस से बहुत ज्यादा तेल खरीदता है और बदले में रूस को उतना भारतीय सामान नहीं बेच पाता, तो रूस के पास बड़ी मात्रा में रुपये जमा हो जाते हैं. सवाल यह है कि रूस उन रुपयों का इस्तेमाल कहां करे? यही वजह है कि केवल स्थानीय मुद्रा में सेटलमेंट शुरू कर देना पर्याप्त नहीं है. इसके लिए मुद्रा की लिक्विडिटी, परिवर्तनीयता, व्यापार संतुलन और मजबूत बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी जरूरी है.

ईरान क्यों कर रहा है लोकल करेंसी की सबसे ज्यादा वकालत?

ईरान का मामला इस बहस को और राजनीतिक बना देता है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान लंबे समय से डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से दबाव महसूस करता रहा है. इसलिए उसके लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार केवल लागत घटाने का उपाय नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक स्वतंत्रता का भी प्रश्न है. ब्रिक्स के मंच से ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल और ऐसे पेमेंट मेकैनिज्म की जरूरत पर जोर दिया जो जीयो-पॉलिटिकल दबाव से व्यापार को सुरक्षित रख सकें. 12 सितंबर को ईरान के विदेश मंत्री ने भी ब्रिक्स के भीतर राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार का समर्थन किया.

क्या चीन डॉलर को चुनौती दे सकता है?

भारत के लिहाज से सच्चाई थोड़ी कड़वी है, लेकिन समझने योग्य भी है. आज की तारीख में अगर कोई मुल्क अपनी मुद्रा को डॉलर के विकल्प के रूप में आगे बढ़ाने की क्षमता रखता है तो वह चीन है. चीन लंबे समय से युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. रूस के साथ उसका व्यापार भी बड़ी मात्रा में युआन में हो रहा है. लेकिन युआन अभी डॉलर के बराबर नहीं है.

वैश्विक फॉरेन-एक्सचेंज कारोबार में डॉलर की हिस्सेदारी अब भी बेहद मजबूत है. इसलिए मौजूदा स्थिति को ‘डॉलर का अंत’ कहना अतिशयोक्ति होगी. असली बदलाव यह है कि कई देश अब यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हर अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के बीच डॉलर अनिवार्य रूप से मौजूद न हो.

BRICS की असली योजना, नई मुद्रा या नया payment network?

ब्रिक्स में एक साझा मुद्रा की चर्चा पिछले कुछ वर्षों में खूब हुई है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर अभी ज्यादा जोर साझा मुद्रा बनाने से ज्यादा पेमेंट इंफ़्रास्ट्रक्चर पर है. ब्रिक्स वाले राष्ट्र अपने फास्ट पेमेंट सिस्टम को जोड़ने, सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC को तालमेल योग्य बनाने और क्रॉस बॉर्डर सेटलमेंट को आसान बनाने पर चर्चा कर रहे हैं. गौर करने वाली बात ये है कि भारत के लिए यहां UPI एक बड़ी ताकत है. अगर भविष्य में भारत का डिजिटल रुपया, रूस का डिजिटल रूबल, चीन का डिजिटल युवान और दूसरे देशों की डिजिटल करेंसीज आपस में सीधे सेटलमेंट कर सकें, तो व्यापार के लिए डॉलर की जरूरत कम हो सकती है.

अमेरिका चुप क्यों नहीं बैठा?

अमेरिका ने ब्रिक्स के de-dollarisation प्रयासों को लेकर पहले ही कड़ा रुख दिखाया है. वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जनवरी 2025 में BRICS देशों को चेतावनी दी थी कि अगर वे डॉलर को हटाकर कोई वैकल्पिक मुद्रा बनाने की कोशिश करते हैं तो अमेरिका 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने पर विचार कर सकता है. फरवरी 2025 में उन्होंने फिर कहा कि डॉलर को चुनौती देने वाले BRICS देशों पर कम से कम 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है. अमेरिका के पास सिर्फ टैरिफ ही हथियार नहीं है. अमेरिकी फाइनैंशल सिस्टम, dollar क्लियरिंग, प्रतिबंध भी उसकी बड़ी ताकत हैं. रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों ने इसी शक्ति का उदाहरण दुनिया के सामने रखा.

BRICS की राह आसान नहीं

यहां BRICS की सबसे बड़ी कमजोरी अमेरिका नहीं बल्कि खुद BRICS के सदस्य देश हैं. भारत और चीन के बीच सीमा और रणनीतिक अविश्वास कायम है. चीन और भारत आर्थिक साझेदार होने के साथ बड़े प्रतिस्पर्धी भी हैं. रूस पश्चिम के साथ टकराव को ब्रिक्स को बड़ा मंच बनाकर चुनौती देना चाहता है, जबकि भारत इस मंच के साथ-साथ अमेरिका और यूरोप के साथ भी अपने संबंध मजबूत रखना चाहता है. ईरान खुलकर पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था से अलग रास्ते की बात करता है, जबकि ब्रिक्स के कई दूसरे सदस्य अमेरिका और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं से गहरे जुड़े हुए हैं.

ये भी पढ़ेंः ‘अगले 20 साल के एजेंडे पर काम करना है’, BRICS समिट में बोले पीएम मोदी- हम किसी के खिलाफ नहीं

यही वजह है कि BRICS को एक एंटी-US अलाएंस के रूप में देखना जल्दबाजी होगी. भारत की कोशिश खास तौर पर इसे ऐसे मंच के रूप में पेश करने की रही है जहां ग्लोबल साउथ अपने आर्थिक हितों के लिए ज्यादा विकल्प हासिल कर सके. विश्लेषकों के मुताबिक समूह की आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक विविधता उसकी एकजुटता के सामने बड़ी चुनौती है.

Exit mobile version