Green Firecrackers Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में ग्रीन पटाखों को लेकर एक दिलचस्प स्थिति सामने आई है, जहां केंद्र सरकार की दो प्रमुख संस्थानों की राय एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है. इसी वजह से नए प्रकार के ग्रीन पटाखों के बड़े पैमाने पर उत्पादन का मामला कानूनी और वैज्ञानिक बहस का विषय बन गया है. इसके साथ ही दोनों के आमने-सामने आने की चर्चा भी हो रही है.
एक ओर CSIR-NEERI का कहना है कि उसके द्वारा विकसित नई पीढ़ी के ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में काफी कम प्रदूषण फैलाते हैं. संस्थान के परीक्षणों के अनुसार इनसे निकलने वाले PM10 और PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों में लगभग 40 से 60 प्रतिशत तक कमी देखी गई.
इसलिए उसने कुछ विशेष प्रकार के ग्रीन पटाखों के व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति देने की सिफारिश की है.दूसरी ओर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने इस प्रस्ताव पर गंभीर आपत्ति जताई है.
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आपत्ति में क्या कहा?
बोर्ड का तर्क है कि इन नए फॉर्मूलों में अभी भी बेरियम नाइट्रेट का उपयोग किया जा रहा है. जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही पटाखों में बेरियम यौगिकों के इस्तेमाल पर रोक लगा चुका है. ऐसे में, चाहे इसकी मात्रा कम ही क्यों न हो, इसे मंजूरी देना अदालत के पुराने आदेश के विपरीत माना जा सकता है. CPCB का यह भी कहना है कि प्रदूषण में कमी के दावों की तुलना पूरी तरह बेरियम-मुक्त विकल्पों से नहीं की गई. इसलिए निष्कर्ष अभी अंतिम नहीं माने जा सकते हैं.
आगे सुप्रीम कोर्ट लेगा फैसला
इन विरोधाभासी रिपोर्टों के कारण पर्यावरण मंत्रालय भी किसी एक पक्ष का समर्थन करने की स्थिति में नहीं दिखा है. मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा कि अंतिम निर्णय अदालत ही ले. हालांकि उसने यह भी बताया कि नए फॉर्मूलों को पहले PESO के पास भेजा गया था, जहां से उन्हें आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) मिल चुका है.
पूरे विवाद का मूल प्रश्न यह है कि यदि किसी पटाखे से प्रदूषण कम होता है लेकिन उसमें प्रतिबंधित रसायन की थोड़ी मात्रा मौजूद रहती है, तो क्या उसे वास्तव में “ग्रीन पटाखा” माना जा सकता है? अब सुप्रीम कोर्ट को वैज्ञानिक शोध, पर्यावरणीय सुरक्षा और अपने पुराने आदेशों के बीच संतुलन बनाते हुए यह तय करना होगा कि ऐसे पटाखों के व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति दी जाए या नहीं.
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