Punjab Court Rules For Family: पंजाब उपभोक्ता आयोग ने LIC के फैसले को पलटते हुए मृतक के पिता के पक्ष में फैसला सुनाया है. बीमा कंपनी ने दावा किया था कि पॉलिसी लेते समय पुरानी हार्ट संबंधी बीमारी की जानकारी छिपाई गई थी. हालांकि, आयोग के सामने LIC इस दावे के समर्थन में पर्याप्त मेडिकल रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी.
पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को 5 लाख रुपये का डेथ क्लेम देने का आदेश दिया है. इसके साथ ही मृतक के पिता को 10 हजार रुपये मुआवजे और मुकदमे के खर्च के तौर पर देने को भी कहा गया है. मामला उस समय सामने आया जब LIC ने पॉलिसीधारक की मौत के बाद उसके परिवार को बीमा राशि देने से इनकार कर दिया था.
क्या है पूरा मामला?
मृतक के पिता के अनुसार, उनके बेटे ने अप्रैल 2022 में LIC की पॉलिसी ली थी. इसकी अवधि अप्रैल 2043 तक थी. अगस्त 2023 में बेटे की हार्ट अटैक से मौत हो गई. इसके बाद पिता ने पॉलिसी के तहत 5 लाख रुपये के डेथ क्लेम के लिए आवेदन किया. लेकिन जनवरी 2024 में LIC ने क्लेम खारिज कर दिया.
बीमा कंपनी ने क्या कहा था?
बीमा कंपनी का तर्क था कि पॉलिसी लेने के दौरान मृतक ने अपनी पुरानी हृदय संबंधी बीमारी की जानकारी नहीं दी थी. LIC के मुताबिक, उसके दिल में छेद था और 2008 में ASD/VSD क्लोजर तथा Fontan प्रक्रिया हुई थी. कंपनी ने दावा किया कि प्रस्ताव फॉर्म में स्वास्थ्य संबंधी सवालों के जवाब में बीमारी की जानकारी नहीं दी गई थी.
परिवार ने खटखटाया आयोग का दरवाजा
इसके बाद मृतक के पिता ने आयोग का दरवाजा खटखटाया, उनका कहना था कि जिस इलाज का जिक्र LIC कर रही है, वह बेटे के नाबालिग रहने के दौरान 2008 में हुआ था. यानी पॉलिसी लेने और उस कथित प्रक्रिया के बीच करीब 14 साल का अंतर था.
सुनवाई के दौरान आयोग ने LIC से बीमारी से जुड़े मेडिकल रिकॉर्ड मांगे. हालांकि, कंपनी ऐसा पर्याप्त रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी, जिससे उसके आरोप की पुष्टि हो सके.
कोर्ट ने क्या सुनाया फैसला?
आयोग ने 1 सितंबर के आदेश में कहा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह साबित नहीं होता कि मृतक ने जानबूझकर महत्वपूर्ण स्वास्थ्य जानकारी छिपाई थी. इसके बाद LIC द्वारा क्लेम खारिज करने को सेवा में कमी मानते हुए 5 लाख रुपये का डेथ क्लेम और 10 हजार रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया गया.
इस मामले से साफ है कि किसी बीमा क्लेम को सिर्फ बीमारी छिपाने के आरोप के आधार पर खारिज करना पर्याप्त नहीं है. बीमा कंपनी को अपने फैसले के समर्थन में भरोसेमंद और सत्यापित दस्तावेज भी पेश करने पड़ सकते हैं.
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