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‘तारीख नहीं फैसला दीज‍िए…’, सु्प्रीम कोर्ट का देश के सभी हाई कोर्ट को आदेश, तय की डेडलाइन

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court Verdict: देश की लगभग हर अदालत में हजारों की संख्या में केस पेंडिंग पड़े हुए हैं. लोगों को न्याय दिलाने के बजाय अदालतों से केवल और केवल तारीख ही मिलती है. इस तरह की व्यवस्था को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की है.

सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट्स के लिए नई गाइडलाइन जारी करते हुए कहा है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रखा जा सकता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्य मामलों में रिजर्व फैसला अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर जमानत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर सख्त टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में देरी सीधे नागरिकों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है. इसलिए बेल याचिकाओं पर फैसला उसी दिन या फिर अधिकतम अगले कार्यदिवस तक सुनाने का निर्देश दिया गया है.

कोर्ट ने माना कि कई बार आदेश सुरक्षित रखने के बाद महीनों तक फैसला नहीं आने से आरोपी और पीड़ित दोनों प्रभावित होते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का हाईकोर्ट को आदेश

नई व्यवस्था के तहत हाई कोर्ट्स को यह भी कहा गया है कि फैसला सुनाने के बाद उसका विस्तृत आदेश सात दिनों के भीतर संबंधित कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया जाए. इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और पक्षकारों को आदेश पाने में देरी नहीं होगी. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि सभी हाई कोर्ट लंबित रिजर्व फैसलों का नियमित रिकॉर्ड रखें और समय-समय पर उनकी समीक्षा करें.

क्‍यों सुप्रीम कोर्ट को कहनी पड़ी इस तरह की बात

दरअसल, पिछले कुछ समय से कई मामलों में फैसले लंबे समय तक सुरक्षित रखे जाने को लेकर सवाल उठ रहे थे. कई याचिकाओं में यह मुद्दा उठाया गया कि अदालतों में सुनवाई पूरी होने के बावजूद महीनों तक आदेश नहीं दिए जाते, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है. इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से न्यायिक प्रक्रिया में तेजी आएगी और लोगों का भरोसा मजबूत होगा. साथ ही हाई कोर्ट्स की जवाबदेही भी बढ़ेगी. हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतों में जजों की कमी और बढ़ते मामलों के बोझ को देखते हुए इन गाइडलाइंस को लागू करना चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है.

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