Datia By-Election Analysis: 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी यानी कि मोहन यादव की सरकार बने ढाई साल से ज्यादा का वक्त हो गया है. इस बीच में लोकसभा के आम चुनाव और एक राज्यसभा चुनाव के साथ चार उपचुनाव भी हो चुके हैं. मगर जितनी चर्चा दतिया विधानसभा के उपचुनाव और उसके परिणाम की हुई है, वैसी पिछले किसी चुनाव की नहीं हुई. इस बात से आप भी सहमत होंगे. पहले एक छोटे से को ऑपरेटिव बैंक के फ्राड केस पर विधायक राजेंद्र भारती को तीन साल की सजा मिलना, दिल्ली में सजा के ऐलान होते ही भोपाल में रात दस बजे विधानसभा सचिवालय का दफ्तर खोलकर दतिया सीट को खाली दिखाने का आर्डर निकालना, फिर चुनाव की तारीखों का ऐलान होना, पिछली बार के हारे विधायक नरोत्तम मिश्रा का चुनाव प्रचार शुरू कर नामांकन फार्म लेना, फिर पोखरन विस्फोट (ये शब्द स्व. प्रभात झा से लिया है) जैसा उनका टिकट कटना, मिश्रा समर्थकों का दतिया बीजेपी के दफतर पर कब्जा कर रात भर हाईवे जाम करना, बीजेपी का डेमेज कंट्रोल कर नरोत्तम को मनाना और नामांकन सभा में उनके आंसुओं का रहस्यमयी तरीके से बहना और पूरा चुनाव मिश्रा जी के इन्हीं आंसुओं की बाढ़ में बहना, डूबना, उतराना और अंत में बीजेपी का चुनाव हार जाना. ये हार तब और बड़ी हो जाती है जब तीसरे प्रत्याशी ने उम्मीद से बहुत ज्यादा वोट पाकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया हो.
चूंकि मध्य प्रदेश की राजनीति में ऐसा चुनाव बहुत अर्से बाद हुआ है जिसकी चर्चा देश प्रदेश की मीडिया में चुनाव तारीखों के ऐलान के बाद से लेकर परिणामों तक रही. इसलिए इस चुनाव के असर को फिर से पढ़ने और समझने की दिलचस्पी रोक नहीं पा रहा. बीजेपी इस चुनाव की घोषणा से बहुत उत्साहित थी. उसे उम्मीद जगी थी कि 230 सदस्यों वाली विधानसभा में उसकी सीट 164 से बढ़कर 165 हो जाएगी साथ ही राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस से तीसरी सीट छीनने के बाद ये जीत पार्टी के राज्य की लीडरशिप और मुख्यमंत्री को और उंचाई देगी. मगर राजनीति का उसूल यही है हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते, बिना उतार-चढ़ाव और ऊंच-नीच की कोई राजनीति होती ही नहीं. आखिर चुनाव के सारे सूत्र अपने हाथ में होने के बाद भी बीजेपी ये चुनाव क्यों हार गई? ये सवाल का जबाव तलाशने के लिये फिर थोड़ा पीछे चलना होगा.
छह बार के विधायक और पाँच बार के मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना इस चुनाव का टर्निंग पाइंट रहा. कद्दावर नेता मिश्रा का टिकट क्यों काटा? इसका जबाव किसी के पास नहीं था मगर इसे पार्टी के सकारात्मक और शुद्धि अभियान के तौर पर पेश किया गया. इसे आम कार्यकर्ता को पीछे से आगे ले जाने वाले सकारात्मक कदम, पार्टी में पीढ़ी परिवर्तन, सालों से विधानसभा में जमें पुराने नेताओं को चेतावनी और वक्त की जरूरत भी बताया गया. मगर यहीं चूक हो गई. नरोत्तम और उनके कार्यकर्ताओं को बिना भरोसे में लिए उठाया गया ये कदम उलटा पड़ा. दतिया में हुए हंगामे से पार्टी की कई सालों से बनाई अनुशासित दल की छवि बिगड़ी और यहीं से बीजेपी बैकफुट पर आकर रक्षात्मक खेलने लगी जो उसकी पहले से सोची समझी गई आक्रामक रणनीति के खिलाफ रही. विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग और सनत जयसूर्या कितना और भला कब तक डिफेंसिव खेलेंगे. विकेट बचाने के चक्कर में वो आउट हो जाते हैं यहां भी यही हुआ.
मध्य प्रदेश में बीजेपी चुनाव जीतने वाली ऐसी मशीन है जो कितना भी बिगड़ा हुआ चुनाव हो अपने पाले में करने में माहिर रही है. बीजेपी ने चुनाव जीतने के कई टोटके विकसित कर लिए हैं, जो वक्त-वक्त पर आजमाये जाते हैं, कमजोर सीट पर मुख्यमंत्री की दो या तीन सभाएं माहौल बदल देती हैं. फिर ऐसा दतिया में क्या हुआ कि सीएम के दो रोड शो और सभाएं भी डेमेज कंट्रोल नहीं कर सकीं. वजह रही बीजेपी का रक्षात्मक चुनाव प्रचार, नरोत्तम मिश्रा और उनके कार्यकर्ताओं को भरोसे में ना लेना, स्थानीय से ज्यादा बाहरी या पार्टी की भाषा में कहें तो प्रवासी कार्यकर्ताओं और नेताओं के प्रचार के भरोसे ज्यादा रहना, स्थानीय फीडबैक की अनसुनी करना, कांग्रेस के पैसा बांटने के नेरेटिव का काउंटर ना करना, तीसरी पार्टी के उम्मीदवार को कम आंकना और उसे आखिरी दौर में उसे अनावश्यक ताकत देना, यादव और कुशवाह वोटरों के बीच पनप रहे आपसी असंतोष की अनदेखी करना, बीजेपी के पूर्व ब्राह्मण नेता अवधेश नायक को आखिर तक कांग्रेस से ना तोड़ पाना और दतिया के विकास को गंभीर मुद्दा ना बना पाना ही बीजेपी के हार का कारण बने.
वैसे दतिया के लोग ही मानते रहे कि ये चुनाव बिना मुद्दों का अनावश्यक चुनाव था, बीजेपी के नए नवेले आशुतोष तिवारी की जगह यदि पार्टी के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा भी ये चुनाव लड़ते तो उनके लिए भी राह आसान नहीं होती. जीतने के लिये उनको भी सब कुछ दांव पर लगाना होता. दो लाख की आबादी वाली दतिया विधानसभा का छोटा सा उपचुनाव बीजेपी ने अपनी इतनी बड़ी फौज के भरोसे लड़ा कि कांग्रेस की जीत छोटी पड़ गई. विधानसभा चुनाव दिसंबर 2023 का परिणाम जुलाई 2026 में फिर दोहराया गया. 2023 का चुनाव दतिया से हारने के बाद नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि “इतना भी गुमान न कर अपनी जीत पर ये बेखबर, तेरी जीत से ज्यादा चर्चा मेरी हार के हैं.” तो यहां भी कांग्रेस की जीत छोटी पड़ गई बीजेपी की हार के आगे. वैसे इस छोटी सी हार में बीजेपी के लिए बहुत बड़े सबक छिपे हैं. जिनको बीजेपी आलाकमान ने जरूर नोट किया होगा.
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