दास्तान-ए-दतिया: दतिया के दिल में क्या है?
दतिया उपचुनाव 2026
झांसी गले की फांसी, दतिया गले का हार, ललितपुर कभी ना छोड़ियो जब तक मिले उधार
Historical Tale Meets Politics: हमारे बुंदेलखंड के तीन शहरों की तासीर बताने वाली यह बहुत पुरानी कहावत है. मगर आज चर्चा सिर्फ दतिया की करेंगे, क्योंकि यहां उपचुनाव हो रहा है और दतिया के ‘दादा’ कहे जाने वाले नरोत्तम मिश्रा को ही साइडलाइन कर दिया गया है.
यही वजह है कि इस छोटे से चुनाव पर देश और प्रदेश, दोनों की निगाहें टिकी हैं. हालांकि ‘जेन जी जंतर-मंतर’ के सफल आंदोलन के बाद इन उपचुनावों की अहमियत और भी बढ़ गई है. तीन जगहों पर हो रहे उपचुनावों के विपरीत नतीजे बीजेपी आलाकमान की चिंता बढ़ा सकते हैं. वहीं अगर पार्टी तीनों सीटें जीत जाती है तो आंदोलन के असर को ‘आया और गया’ मानकर राहत की सांस ले सकेगी.
दिल्ली के आंदोलन का असर दतिया तक?
वैसे दतिया की आबोहवा में भी यही सवाल घूम रहा है कि दतिया से साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर दिल्ली में हुआ आंदोलन क्या इस चुनाव पर भी असर डाल रहा है. इसका जवाब हमें दतिया के किला चौक पर मिले अविनाश यादव ने दिया. उनका कहना है कि आंदोलन के बाद युवाओं में हौसला आया है. यदि आज हम किसी पार्टी के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं तो वह ताकत आंदोलन की सफलता से ही मिली है. वरना लगातार जीतती आ रही पार्टी के नेताओं और उनके लोगों से हमेशा डर बना रहता था. झूठी एफआईआर का भय भी लोगों के मन में रहता था.
किले की शान पर बाजार हावी
दतिया शहर के ठीक बीचों-बीच बना प्रतापगढ़ किला वैसे तो महाराजा दलपत राव ने करीब आठ सौ साल पहले बनवाया था, जहां आज कांग्रेस प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह रहते हैं. मगर किले के मुख्य प्रवेश द्वार पर जिस तरह छोटी-बड़ी दुकानों का अतिक्रमण है, उससे साफ हो जाता है कि यह किला यहां रहने वाले राजा-महाराजाओं की प्राथमिकता नहीं रहा है.

किले के भीतर लोहे की कीलों से जड़े विशाल राजगढ़ दरवाजे और पास रखी विशाल तोप पुराने वैभव की याद तो दिलाते हैं, लेकिन दरवाजा पार करते ही बड़ा बाजार बता देता है कि किले की शान-शौकत पर बाजार हावी हो चुका है. कस्बे का बाजार किले के भीतर तक घुस आया है और इसी किले में कांग्रेस का दफ्तर भी खुला हुआ है.
‘राजा’ का सादगी भरा चुनाव प्रचार
किले के कुंवर घनश्याम सिंह हमें किले के नीचे बाजार के बाद की संकरी गलियों वाले मोहल्ले में प्रचार करते मिल जाते हैं. उनकी बेहद साधारण वेशभूषा और व्यक्तित्व देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि यही दतिया के राजा हैं. वह बेहद सामान्य तरीके से गलियों में घूमते हुए लोगों से हाथ जोड़कर सिर्फ इतना कहते हैं, “आप ख्याल रखिएगा.” इतना सुनते ही सफेद बालों वाले एक बुजुर्ग हाथ जोड़कर कहते हैं, “आप राजा हैं, हम आपकी प्रजा. ऐसा मत कहिए. आपका इस गली में आना ही बहुत है.” कहने को भले ही देश से राजे-रजवाड़े खत्म हो गए हों, लेकिन जनता के दिल और दिमाग में राजा-महाराजा आज भी जिंदा हैं.
‘राजा-रंक’ वाले सवाल पर घनश्याम सिंह का जवाब
कुंवर घनश्याम सिंह से पूछा गया कि दतिया के ‘दादा’ नरोत्तम मिश्रा कहते हैं कि दतिया का चुनाव राजा और रंक का हो गया है. इस पर मुस्कुराते हुए उनका जवाब आया, “मैं कहां पैदा हुआ, इस पर मेरा कोई बस नहीं है. लेकिन मेरे प्रतिद्वंद्वियों से पूछ लीजिए कि वे अगले जन्म में किस घर में पैदा होना चाहेंगे, तो राजा-रंक का भेद करना छोड़ देंगे.” वैसे घनश्याम सिंह राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं. वह तीन बार विधायक रह चुके हैं.

दो बार पड़ोसी विधानसभा सेवढ़ा से और एक बार दतिया से. उनका मानना है कि यदि नरोत्तम मिश्रा मैदान में होते तो मुकाबला मुश्किल होता, लेकिन उनका टिकट काटकर एक अपेक्षाकृत अनजान चेहरे को मैदान में उतारने से चुनाव उनके लिए आसान हो गया है.
नरोत्तम मिश्रा की टिकट कटने से बदला समीकरण
वैसे यह बात भी सच है कि मध्य प्रदेश की राजनीति के कद्दावर नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा छह बार विधायक रहे हैं, जिनमें तीन बार दतिया से चुने गए. चुनाव की घोषणा से पहले ही उनकी सक्रियता बढ़ गई थी और वह मानकर चल रहे थे कि उपचुनाव वही लड़ेंगे. मगर बीजेपी ने ऐन वक्त पर फैसला बदलते हुए उनकी टिकट काट दी और आरएसएस पृष्ठभूमि के कार्यकर्ता आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया. इसके बाद जो हुआ, वह अनुशासित मानी जाने वाली बीजेपी में कम ही देखने को मिलता है. नरोत्तम समर्थकों ने आपा खो दिया और शहर से गुजरने वाले हाईवे को करीब आठ घंटे तक जाम रखा.

समर्थकों की नाराजगी को और हवा तब मिली, जब नामांकन के बाद हुई सभा में नरोत्तम मिश्रा मंच से भावुक होकर रो पड़े. हालांकि उन्होंने कहा कि उनके आंसू किसी के प्रति नाराजगी के नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं पर हुए पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ थे. इसी दौरान उन्होंने यह भी कहा, “मैं भूलने वाला व्यक्ति नहीं हूं. सब याद रखा जाएगा.”
बीजेपी और कांग्रेस, दोनों के लिए ‘मुद्दा’ बने नरोत्तम
दतिया चुनाव में नरोत्तम मिश्रा अपने आप में एक बड़ा मुद्दा बने हुए हैं, जिसे बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही नजरअंदाज नहीं कर पा रही हैं. बीजेपी ने उन्हें प्रचार में जरूर उतारा है, लेकिन उनके समर्थक चुनाव प्रचार से दूरी बनाकर सिर्फ अपने नेता के आसपास रहकर उनके इशारों को समझने की कोशिश करते दिखाई देते हैं. दूसरी ओर कांग्रेस भी मानकर चल रही है कि नरोत्तम समर्थकों की नाराजगी बीजेपी के खिलाफ वोट में बदल सकती है और इससे मुकाबला आसान होगा.
बाहरी नेताओं के भरोसे चुनाव अभियान
बीजेपी ने सतर्कता बरतते हुए चुनाव अभियान की बड़ी जिम्मेदारियां बाहर से आए भरोसेमंद नेताओं को सौंप रखी हैं. सरकार के मंत्री, विधायक, सांसद, पूर्व मंत्री और पूर्व विधायक बूथ, सेक्टर और शक्ति केंद्रों पर मतदाताओं को साधने में जुटे हैं. बड़ी संख्या में आए पार्टी कार्यकर्ता भी शहर और गांवों में होने वाली सभाओं में कुर्सियां भरते नजर आते हैं. इसकी बड़ी वजह जनता में इस चुनाव को लेकर अपेक्षाकृत कम उत्साह दिखाई देना है.
कांग्रेस भी बाहरी नेतृत्व के सहारे
कमोबेश यही स्थिति कांग्रेस की भी है. उसके प्रचार अभियान में भी स्थानीय नेताओं की कमी को बाहर से आए नेता और कार्यकर्ता पूरा कर रहे हैं. जीतू पटवारी के साथ कांग्रेस के छोटे-बड़े पदाधिकारी और उमंग सिंघार के साथ पार्टी के विधायक चुनाव में पूरी ताकत झोंक रहे हैं. कांग्रेस को उम्मीद है कि नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी उसे फायदा पहुंचा सकती है. जीतू पटवारी गांव-गांव जाकर बीजेपी पर वोटरों को पैसा बांटने का आरोप लगाते हुए नैरेटिव तैयार कर रहे हैं.

वह कहते हैं कि अगर बीजेपी के लोग एक वोट के बदले पांच हजार रुपये देने आएं तो पैसा ले लेना, लेकिन वोट कांग्रेस को देना. हालांकि बीजेपी की सत्ता और संगठन की ताकत से कांग्रेस की चिंता भी साफ दिखाई देती है. दतिया में ग्रामीण मतदाता अधिक हैं. घूमने पर गांवों में कांग्रेस और शहर में बीजेपी का असर अपेक्षाकृत ज्यादा नजर आता है.
तीसरे कोण के रूप में आजाद समाज पार्टी
मगर यह चुनाव सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई नहीं है. आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव इस मुकाबले का तीसरा कोण बनकर उभरे हैं. वह काफी पहले से चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे थे. चर्चा यह भी है कि दादा नरोत्तम मिश्रा, दामोदर की मौजूदगी से कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की रणनीति बना रहे थे. हालांकि अब नरोत्तम खुद चुनाव में नहीं हैं, लेकिन माना जा रहा है कि दामोदर यादव 10 से 12 हजार वोट हासिल कर दोनों दलों का समीकरण बिगाड़ सकते हैं. वह कांग्रेस के दलित वोट बैंक के साथ-साथ बीजेपी के ओबीसी यादव वोटों में भी सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं. आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद भी दतिया की गलियों में घूमकर खासतौर पर दलित युवाओं को अपने पक्ष में जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं.

कुल मिलाकर यह चुनाव बीजेपी और कांग्रेस, दोनों के लिए फंसा हुआ मुकाबला नजर आ रहा है. कोई भी पार्टी पूरे आत्मविश्वास और पूरी सच्चाई के साथ जीत का दावा करती दिखाई नहीं देती. दतिया के लोग फिलहाल खामोश हैं और अपने दिल की बात खुलकर नहीं बता रहे हैं. इसलिए दतिया के दिल में आखिर क्या है, यह जानने के लिए 30 जुलाई को होने वाले मतदान और 3 अगस्त की मतगणना तक इंतजार करना होगा.
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