नवरात्रि की अंतिम दिवस के अगले दिन पूरे देश में भर दशहरे का त्योहार मानया जाता है. इस त्योहार को असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है. अलग-अलग शहरों रावण वध और रावण दहन जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होता हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक ऐसा गांव है जहां रावण दहन नहीं बल्कि उसकी पूजा की जाती है. इतना ही नहीं दशहरे के दिन गांव वाले शोक भी मनाते हैं. आइए इस अनोखी परंपरा के बारे में विस्तार से जानते है.
विदिशा जिले 29 किमी दूर है ये गांव
हम विदिशा जिले की नटेरन तहसील की एक गांव की बात कर रहे हैं. इस गांव का नाम भी ‘रावण गांव’ है. ये गांव जिला मुख्यालय से करीब 29 किमी दूर है. इस गांव में परमार काल का एक बड़ा प्रचीन रावण मंदिर है, जहां पर करीब 10 फीट लंबी रावण की पत्थर की लेटी हुई प्रतिमा स्थापित है. इस मूर्ती को लगभग 500 साल पुराना बताया जाता है.
गांव को लोग मनाते हैं शोक
दशहरे पर जहां देशभर में उत्सव का माहौल रहता है वहीं इस गांव में ठीक उलट रावण का पुतला जलाने के बजाय उनकी विधि-विधान से पूजा, आरती, हवन और भंडारे का आयोजन किया जाता है. स्थानीय लोग रावण को अपना इष्ट देवता मानते हैं, इसलिए अगर कहीं पर भी रावण का पुलता जलाया जाता है तो वह वहां जाने से परहेज करते हैं.
पहला निमंत्रण लंकेश को….
इतना ही नहीं गांव के लोग शादी जैसे किसी भी शुभ अवसर पर पहला निमंत्रण रावण को ही देते हैं. इसके अलावा, मंदिर के पास स्थित एक तालाब के बीच में पत्थर की एक तलवार भी गड़ी हुई है, जिसे ग्रामीण रावण की पौराणिक ‘चंद्रहास तलवार’ मानते हैं. यहां के लोगों में रावण को विद्या और वीरता का देवता मानने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है.
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