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MP News: स्मार्ट क्लास के 10 हजार इंटरएक्टिव पैनलों की कीमत पर घमासान, 70 करोड़ से ज्यादा भुगतान करने पर सवाल

MLA Hemant Katare and Minister Uday Pratap Singh (File Photo)

विधायक हेमंत कटारे और मंत्री उदय प्रताप सिंह(File Photo)

MP News: मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास योजना के तहत खरीदे गए 10 हजार इंटरएक्टिव पैनलों की कीमत को लेकर विधानसभा में बड़ा मुद्दा उठ गया है. कांग्रेस विधायक हेमंत कटारे के सवाल पर स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने सदन में जानकारी दी कि राज्य स्तर पर प्रति पैनल 1,14,850 रुपये की दर से खरीदी की गई. इस दर में तीन वर्ष की कॉम्प्रिहेंसिव वारंटी, इंस्टॉलेशन, प्रशिक्षण, थर्ड पार्टी निरीक्षण और अन्य सेवाएं शामिल हैं. मूल कीमत 97,330 रुपये बताई गई हैं, जिस पर 18 प्रतिशत जीएसटी जोड़ा गया.

बेहतर स्पेसिफिकेशन, अतिरिक्त सेवाओं के कारण कीमत में अंतर

मंत्री ने स्पष्ट किया कि जिलों द्वारा पहले खरीदे गए इंटरएक्टिव पैनल एंड्रॉइड 11 और 4 जीबी रैम कॉन्फिग्रेशन के थे, जबकि राज्य स्तर पर लिए गए पैनल एंड्रॉइड 13 और 8 जीबी रैम जैसी उन्नत तकनीक के साथ खरीदे गए. इन पर तीन साल की ऑनसाइट कॉम्प्रिहेंसिव वारंटी (इंश्योरेंस समेत) और इंस्टॉलेशन सपोर्ट दिया गया है. विभाग का तर्क है कि बेहतर स्पेसिफिकेशन और अतिरिक्त सेवाओं के कारण कीमत में अंतर आया.

प्रति पैनल कीमत एक लाख 6 हजार रुपये तक पहुंची

हालांकि, विवाद तब गहराया जब 24 अक्टूबर 2025 को जेम (GeM) पोर्टल पर जारी बिड क्रमांक GEM/2025/B/6498865 का हवाला देते हुए यह बताया गया कि उसी तरह के इंटरएक्टिव पैनल की कीमत 70,000 रुपये दर्ज थी. सरकार की ओर से कहा गया कि 70,000 रुपये केवल बेस यूनिट की कीमत थी, जिसमें ना तो जीएसटी शामिल था और ना ही इंस्टॉलेशन व वारंटी जैसी सेवाएं हैं. सभी टैक्स और तीन साल की वारंटी जोड़ने पर प्रति पैनल प्रभावी कीमत 1,06,125 रुपये तक पहुंचती हैं.

’70 करोड़ की बचत हो सकती थी’

विपक्ष ने इस स्पष्टीकरण को अपर्याप्त बताते हुए बड़ा आरोप लगाया है. विधायक हेमंत कटारे ने दावा किया कि यदि 70,000 रुपये की दर पर खरीदी होती तो लगभग 10 हजार पैनलों पर करीब 70 से 71 करोड़ रुपये की बचत हो सकती थी. उनका कहना है कि मुख्य सचिव के एक पत्र के बाद केंद्रीकृत खरीदी की प्रक्रिया अपनाई गई, जिससे कीमतों में वृद्धि हुई और राज्य को अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ा.

सरकार की ओर से कहा गया कि पूरी प्रक्रिया तकनीकी विनिर्देशों और नियमों के अनुरूप की गई है तथा भुगतान 50 प्रतिशत, 30 प्रतिशत और 20 प्रतिशत के निर्धारित चरणों में किया जाता है. आपूर्ति के बाद गुणवत्ता परीक्षण और सत्यापन के उपरांत ही अंतिम भुगतान किया जाता है.

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