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MP News: 3 करोड़ के बैंक ऋण में धोखाधड़ी का खुलासा, EOW ने दर्ज की FIR

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MP News: आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने करीब 3 करोड़ रुपये के बैंक ऋण में सुनियोजित धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज किया है. शिकायत के आधार पर की गई विस्तृत जांच में प्रथम दृष्टया आरोप सही पाए जाने पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत प्रकरण पंजीबद्ध किया गया है.

ईओडब्ल्यू को 12 जून 2019 को भोपाल निवासी दीपक भावसार से लिखित शिकायत प्राप्त हुई थी. शिकायत में आरोप लगाया गया कि राहुल दुबे, संगीता दुबे, प्रताप नारायण दुबे, अतुल दुबे, भुवनेश्वर पाण्डे एवं स्वाति शुक्ला सहित अन्य व्यक्तियों ने सुनियोजित साजिश के तहत शिकायतकर्ता की भोपाल स्थित तीन बहुमूल्य संपत्तियों को गिरवी रखकर लगभग 3 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट प्राप्त की और राशि का दुरुपयोग किया.

कंपनी बनाकर लिया गया ऋण

जांच में सामने आया कि वर्ष 2017 में आरोपियों ने कंपनी स्थापित करने के नाम पर शिकायतकर्ता को विश्वास में लिया. 14 मार्च 2017 को कंपनी का पंजीयन कराया गया, जिसमें शिकायतकर्ता को डायरेक्टर बनाया गया. हालांकि कंपनी का वास्तविक संचालन प्रताप नारायण दुबे और भुवनेश्वर पाण्डे द्वारा किया जा रहा था.

आरोप है कि शिकायतकर्ता की भोपाल स्थित एक फ्लैट, एक दुकान तथा ग्राम मेण्डोरी की भूमि को पीएनबी, शाखा सियागंज, इंदौर में को-लेटरल सिक्योरिटी के रूप में बंधक रखकर 3 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट स्वीकृत कराई गई. 27 मई 2017 को एक एमओयू भी निष्पादित किया गया था, जिसमें लाभ और वेतन देने का आश्वासन दिया गया था.

2.81 करोड़ रुपये अन्य कंपनियों में ट्रांसफर

जांच में पाया गया कि स्वीकृत सीमा में से बैंक शुल्क कटने के बाद लगभग 2.81 करोड़ रुपये जून से अक्टूबर 2017 के बीच विभिन्न कंपनियों के खातों में स्थानांतरित किए गए. इनमें 14 कंपनी शामिल हैं. अधिकांश कंपनियां आरोपियों या उनके परिजनों से संबंधित पाई गईं.

जाली दस्तावेज और संदिग्ध हस्ताक्षर

18 अगस्त 2017 के एक बोर्ड रेजॉल्यूशन में भुवनेश्वर पाण्डे को दो कारों की खरीद के लिए 18.50 लाख रुपये का ऋण लेने की अनुमति दर्शाई गई थी. जांच में पाया गया कि इस रेजॉल्यूशन में शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर संदिग्ध हैं. बैठक की विधिवत कार्रवाई या सूचना का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिला. शिकायतकर्ता ने बयान में ऐसी किसी बैठक से इनकार किया.

संपत्तियों पर नीलामी का खतरा

ऋण अदायगी नहीं होने पर बैंक द्वारा वसूली की कार्यवाही शुरू की गई, जिससे शिकायतकर्ता की गिरवी रखी संपत्तियां नीलामी की स्थिति में पहुंच गईं. जांच में यह भी सामने आया कि ऋण राशि के उपयोग के बाद आरोपियों ने कंपनी का संचालन बंद कर दिया और स्थान परिवर्तन कर लिया.

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