Morena: चंबल नदी के किनारे बसे गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं. ग्राम पंचायत वरेण्ड से करीब 6 किलोमीटर दूर चंबल के बीहड़ों में बसे गांवों तक पहुंचना बारिश के दिनों में किसी चुनौती से कम नहीं है. ग्रामीणों के साथ-साथ यहां पदस्थ शिक्षकों को भी कई बार कई दिनों तक पैदल चलकर स्कूल पहुंचना पड़ता है.
इन गांवों में सबसे ज्यादा परेशानी
बताया जाता है कि चंबल किनारे बसे झेंद, विरजापुरा, बेदपुरा, जुगरुआपुरा, आमुलीपुरा, होरावारा और मल्लपुरा सहित कई गांवों में आज तक पक्की सड़क की सुविधा नहीं है. बारिश के दौरान खार, नाले और बीहड़ के रास्ते बाधित हो जाते हैं, जिससे बच्चों का स्कूल पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है. इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई पर पड़ता है और कई बार दो से तीन महीने तक बच्चे नियमित स्कूल नहीं पहुंच पाते.
कागजों में काम पूरा पर जमीन पर…
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत स्तर पर सीसी खरंजे और सड़क निर्माण जैसे कार्य कागजों में पूरे दिखा दिए जाते हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है. बाढ़ आने पर इन गांवों का संपर्क कई-कई दिनों तक मुख्य क्षेत्र से कट जाता है. बिजली भी 8 से 10 दिनों तक गुल रहने की शिकायत सामने आती है.
जच्चा-बच्चा दोनों की जान पर खतरा
सबसे गंभीर स्थिति प्रसव के समय बनती है. ग्रामीणों के अनुसार सड़क और आवागमन की सुविधा नहीं होने के कारण कई बार गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के बजाय गांव में ही प्रसव कराने की मजबूरी पैदा हो जाती है. इससे जच्चा-बच्चा दोनों की जान पर खतरा बना रहता है.
कमजोर मोबाइल नेटवर्क
वहीं, कमजोर मोबाइल नेटवर्क के कारण शिक्षकों को ई-अटेंडेंस लगाने में भी परेशानी होती है. बारिश के मौसम में खराब रास्तों और जंगल से होकर स्कूल पहुंचना उनके लिए जोखिम भरा रहता है. इसके बावजूद शिक्षकों पर समय पर स्कूल पहुंचने और उपस्थिति दर्ज कराने का दबाव रहता है.
ठोस कार्रवाई अब तक नहीं हुई
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार ने कई बार चंबल किनारे की बस्तियों को सुरक्षित स्थानों पर विस्थापित करने की बात कही, लेकिन पुनर्वास के लिए ठोस कार्रवाई अब तक नहीं हुई. बाढ़ और कटाव के कारण कई बस्तियां बिखर गई हैं और लोग बीहड़ में एक-दो किलोमीटर तक दूर-दूर घर बनाकर रहने को मजबूर हैं.
ग्रामीणों की प्रशासन से मांग
स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब तक इन गांवों में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और सुरक्षित पुनर्वास की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक विकास के दावे धरातल पर कैसे सच साबित होंगे? ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि इन गांवों का सर्वे कराकर स्थायी सड़क, बिजली, स्वास्थ्य सुविधा और बाढ़ से सुरक्षित पुनर्वास की व्यवस्था की जाए. ग्रामीणों की पीड़ा साफ है-आजादी के इतने वर्षों बाद भी चंबल किनारे बसे इन गांवों तक विकास की राह क्यों नहीं पहुंची?
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