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Tikamgarh News: बेटी होने की सजा, टीकमगढ़ में 20 दिन की पोती की मौत, दादी पर गला घोंटकर हत्या का आरोप

Palera Police Station

पलेरा थाना

Tikamgarh News: टीकमगढ़ जिले के पलेरा थाना क्षेत्र से एक ऐसी दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है. यहां महज 20 दिन की मासूम बच्ची की गला घोंटकर हत्या कर दी गई. आरोप किसी और पर नहीं, बल्कि उसकी अपनी दादी पर लगा है. पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी दादी बेटी के जन्म से नाराज थी. इस घटना ने बेटियों के प्रति समाज में अब भी मौजूद भेदभावपूर्ण सोच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

सरकार एक ओर बेटियों को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए लाड़ली लक्ष्मी और लाड़ली बहना जैसी योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी ओर बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में बेटियों को लेकर पुरानी मानसिकता अब भी देखने को मिल रही है.

दादी ने की 20 दिन की मासूम पोती की हत्या

पलेरा थाना क्षेत्र के बन्नेबुजुर्ग गांव में 20 दिन की मासूम मनीषा अपनी मां पुक्खन आदिवासी के साथ सो रही थी. आरोप है कि रविवार तड़के करीब 3 बजे उसकी दादी रेखा आदिवासी बच्ची को उठाकर ले गई और कुछ देर बाद वापस मां के पास लिटाकर चली गई. जब काफी देर तक बच्ची के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई तो मां को शक हुआ. उसने बच्ची को उठाकर देखा, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी.

घटना के बाद परिजनों ने पुलिस को बताया कि बच्ची की तबीयत खराब थी और झाड़-फूंक के बाद उसकी मौत हुई है. लेकिन पुलिस को मामला संदिग्ध लगा और गहन पूछताछ शुरू की गई. पुलिस जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ. पूछताछ के दौरान आरोपी दादी रेखा आदिवासी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. पुलिस के अनुसार, वह बेटी के जन्म से नाराज थी और कथित तौर पर बेटियों को पसंद नहीं करती थी.

जिम्मेदारी की डर से दादी ने मासूम की जान ली

मृत बच्ची की मां पुक्खन ने भी आरोप लगाया है कि बेटी के जन्म के बाद से उसकी सास उसके साथ बुरा व्यवहार करती थी और कई बार उसे खाना तक नहीं दिया जाता था. पुलिस के मुताबिक आरोपी का मानना था कि बेटी होने पर भविष्य में शादी और अन्य जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ेगा. इसी सोच के चलते उसने इस जघन्य वारदात को अंजाम दिया.

आज भी बेटियों के साथ भेदभाव हो रहा

20 दिन की मासूम की हत्या की यह घटना सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि समाज में बेटियों के प्रति अब भी मौजूद भेदभावपूर्ण मानसिकता का भयावह चेहरा है. सवाल यह है कि आखिर बेटियों को बचाने और सम्मान देने के संदेश गांव-गांव तक कब पहुंचेंगे.

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