MP News: इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों को लेकर दायर याचिका पर मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई, जिसमें न्यायालय ने शासन और नगर निगम की रिपोर्टों पर कई गंभीर टिप्पणियां कीं. कोर्ट ने डेथ ऑडिट रिपोर्ट में अस्पष्टता, पानी की टेस्टिंग के सीमित मानक, बोरवेल बंद करने के बाद भी दूषित पानी की आपूर्ति और मुआवजे में विसंगति पर सवाल खड़े किए.
‘कोर्ट ने डेथ ऑडिट रिपोर्ट को गुमराह करने वाली बताया’
याचिकाकर्ता पक्ष के अधिवक्ता अजय बागड़िया ने बताया कि न्यायालय ने शासन द्वारा प्रस्तुत डेथ ऑडिट रिपोर्ट को गुमराह करने वाला कहा है. रिपोर्ट में मौतों के कारण स्पष्ट नहीं थे और ‘वॉटर बर्न डिजीज’ जैसे संदिग्ध शब्दों के उपयोग पर भी कोर्ट ने आपत्ति जताई. कई मौतों को लेकर सरकार की ओर से ‘जानकारी नहीं’ कहा जाना भी अदालत ने गंभीर माना. जबकि जिला प्रशासन ने 28 मौतों में से 16 मौतों को एपेडेमिक माना है,और बाकी की मौतों की जानकारी नहीं होने की जानकारी दी, जिसे न्यायालय ने संदिग्ध माना है.
‘प्रभावित क्षेत्र के 18 बोरवेल बंद कर दिए गए‘
वहीं नगर निगम की और से तर्क दिया कि प्रभावित क्षेत्र के 18 बोरवेल बंद कर दिए गए हैं, लेकिन दूषित पानी घरों तक कैसे पहुंचा, इसका स्पष्ट उत्तर नहीं मिल सका. साथ ही नगर निगम द्वारा केवल 8 मानकों पर पानी की टेस्टिंग किए जाने पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया, जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पहले ही 34 मानकों पर जांच करता कर चुका है. पाइपलाइन बदलने के टेंडर और उसके समय पर भी अदालत ने सवाल उठाए. वहीं मुआवजे के मुद्दे पर भी न्यायालय ने असंतोष व्यक्त किया. बागड़िया ने बताया कि सरकार द्वारा घोषित दो लाख रुपये का मुआवजा वास्तव में रेड क्रॉस चैरिटी फंड से दिया जा रहा है, जबकि सामान्य दुर्घटनाओं में भी चार लाख तक का प्रावधान रहता है. कोर्ट ने पूरी सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया है.
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