Input- आरके बघेल
MP News: सरकार आदिवासी बच्चों की शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है. लेकिन मंडला की यह तस्वीर उन दावों की हकीकत बयां कर रही है. यहां बैगा बाहुल्य गांव के मासूम बच्चों को स्कूल नहीं, बल्कि सरपंच का घर क्लासरूम बन गया है. वजह है सरकारी स्कूल की ऐसी जर्जर हालत कि बारिश में छत से मलबा गिरता है, पानी टपकता है और हर पल हादसे का डर बना रहता है.
‘8-9 सालों से स्कूल जर्जर हालत में हैं’
मंडला जिले की जन्तीपुर ग्राम पंचायत के कुदई टोला में करीब 150 बैगा परिवार रहते हैं. इन्हीं परिवारों के बच्चों के लिए शासकीय प्राथमिक शाला कोंडरा-टोला संचालित है. लेकिन यह स्कूल पिछले 8 से 9 वर्षों से जर्जर हालत में खड़ा है. पहली से पांचवीं तक पढ़ने वाले करीब 30 से 35 मासूम बच्चों के सिर पर हर दिन खतरा मंडराता है. बारिश शुरू होते ही स्कूल की छत से पानी टपकता है, सीलिंग का मलबा गिरता है और दीवारें भी जवाब देती नजर आती हैं. ऐसे में स्कूल में पढ़ाई कराना जोखिम भरा हो गया है.
छत से गिरता मलबा और टपकता पानी
हालात इतने खराब हैं कि बच्चों की पढ़ाई कभी आंगनवाड़ी में, कभी रंगमंच में, कभी किराए के भवन में तो अब लगातार हो रही बारिश के कारण गांव के सरपंच संतलाल मरावी के घर में कराई जा रही है. सरकारी स्कूल होने के बावजूद बच्चों का क्लासरूम एक जनप्रतिनिधि का घर बन चुका है. बच्चे भी बताते हैं कि उन्हें अपने स्कूल में बैठने से डर लगता है. छत से गिरता मलबा और टपकता पानी हर वक्त हादसे का डर पैदा करता है. मजबूरी में सरपंच के घर बैठकर पढ़ाई कर रहे, ये बच्चे सिर्फ एक सुरक्षित स्कूल की मांग कर रहे हैं.
शिकायत के बाद जिम्मेदारों से सिर्फ आश्वासन मिला
ग्रामीणों और शिक्षकों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि उन्होंने प्रशासन का दरवाजा नहीं खटखटाया. कई बार अधिकारियों को आवेदन दिए गए, जर्जर भवन की शिकायत की गई और मरम्मत का आश्वासन भी मिला. लेकिन फाइलें चलती रहीं और स्कूल की हालत नहीं बदली. आखिरकार बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए सरपंच संतलाल मरावी ने अपने घर के दरवाजे खोल दिए.
जब इस पूरे मामले को लेकर जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी) अशोक शुक्ला से सवाल किया गया तो उन्होंने माना कि मंडला जिले में करीब 580 स्कूल जर्जर हालत में हैं. उनका कहना है कि वे हाल ही में पदस्थ हुए हैं और इस संबंध में आगे पत्राचार कर कार्रवाई की जाएगी.
बच्चे सुरक्षित स्कूल का इंतजार कर रहे
सरकारी योजनाओं में शिक्षा को सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया जाता है, लेकिन कुदई टोला की यह तस्वीर उन दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है. जहां एक ओर सरकार ‘हर बच्चे को बेहतर शिक्षा’ का सपना दिखा रही है, वहीं दूसरी ओर बैगा समाज के मासूम बच्चे आज भी सुरक्षित स्कूल की आस लगाए बैठे हैं. सरपंच का घर फिलहाल उनका सहारा जरूर बन गया है, लेकिन यह किसी व्यवस्था की सफलता नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की नाकामी की सबसे बड़ी मिसाल है. अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ पत्राचार तक सीमित रहते हैं या इन बच्चों को भी वह सुरक्षित स्कूल मिलता है.
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