Vistaar NEWS

MP News: नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियों के विसर्जन पर NGT सख्त, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड से मांगी रिपोर्ट

NGT

एनजीटी

MP News: मध्य प्रदेश की जीवनरेखा मानी जाने वाली नर्मदा नदी में धार्मिक आयोजन के दौरान 11 हजार लीटर दूध अर्पित करने और 210 साड़ियों के विसर्जन के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सख्त रुख अपनाया है. ट्रिब्यूनल ने इस मामले में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) से वैज्ञानिक रिपोर्ट तलब की है.

सीहोर के धार्मिक आयोजन से जुड़ा मामला

यह मामला सीहोर जिले के सतदेव और भेरूंदा क्षेत्र में अप्रैल महीने में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम से जुड़ा है. घटना को लेकर एनजीटी की भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच में याचिका दायर की गई थी, जिस पर जस्टिस श्यो कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने सुनवाई की.

याचिका में पर्यावरण को नुकसान की आशंका

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि नसरुल्लागंज तहसील के ग्राम सतदेव और भेरूंदा में हुए धार्मिक आयोजन के दौरान बड़ी मात्रा में दूध और साड़ियों को नर्मदा नदी में प्रवाहित किया गया. याचिका में इसे पर्यावरण और नदी की पारिस्थितिकी के लिए नुकसानदायक बताया गया. साथ ही आशंका जताई गई कि इससे जल प्रदूषण बढ़ सकता है, जलीय जीवों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है और सिंचाई व पेयजल स्रोत प्रभावित हो सकते हैं.

एनजीटी ने मांगा वैज्ञानिक आधार

सुनवाई के दौरान एनजीटी ने कहा कि अब तक दूध विसर्जन से जल प्रदूषण होने संबंधी कोई ठोस वैज्ञानिक आंकड़े पेश नहीं किए गए हैं. हालांकि अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 की धारा 24 के तहत किसी भी प्रकार के प्रदूषक पदार्थ को जल स्रोतों में छोड़ना प्रतिबंधित है.

जलीय जीवन पर असर की चिंता

ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में कहा कि दूध जैसे कार्बनिक पदार्थ पानी में जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD) बढ़ा सकते हैं, जिससे जलीय जीवन प्रभावित होने की आशंका रहती है. पीठ ने यह भी माना कि धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान नदियों में दूध प्रवाहित करने की परंपरा अब सार्वजनिक और पर्यावरणीय बहस का विषय बन चुकी है.

प्रदूषण बोर्ड को दिए गए निर्देश

एनजीटी ने CPCB और MPPCB को निर्देश दिए हैं कि विशेषज्ञों से इस विषय पर वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि क्या ऐसी गतिविधियां मौजूदा दिशा-निर्देशों के तहत नियंत्रित हैं. यदि नहीं, तो क्या इनके लिए अलग से नियम बनाए जाने की आवश्यकता है. साथ ही यह भी पूछा गया है कि धार्मिक आयोजनों में नदी में दूध प्रवाहित करने से वास्तव में जल प्रदूषण होता है या नहीं.

जुलाई में होगी अगली सुनवाई

मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी. तब तक दोनों प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को अपनी report ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी.

ये भी पढ़ें- Jabalpur News: जबलपुर के ‘स्टोन मैन’ ने नर्मदा नदी से जुटाए विज्ञान को चौंकाने वाले अनोखे पत्थर और फॉसिल्स, जानिए कहानी

Exit mobile version