Mauganj News: मऊगंज जिले के नईगढ़ी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ का पानी भले ही अब उतर चुका हो लेकिन अपने पीछे तबाही और दर्द की ऐसी कहानी छोड़ गया है. जिसने सैकड़ों परिवारों की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया है. कई गांवों में घर धराशायी हो गए हैं, दीवारें कमजोर होकर गिरने की स्थिति में हैं. अनाज और गृहस्थी का सामान बर्बाद हो चुका है, जबकि प्रभावित परिवार खुले आसमान के नीचे सड़क किनारे रात गुजारने को मजबूर हैं. बाढ़ के बाद सामने आई तस्वीरें प्रशासनिक तैयारियों और राहत व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं.
मौहरिया गांव में सबसे ज्यादा तबाही
नईगढ़ी क्षेत्र के मौहरिया गांव के हरिजन और आदिवासी टोले में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है. ग्रामीणों के अनुसार करीब डेढ़ सौ से अधिक लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं. आठ से अधिक मकान पूरी तरह जमींदोज हो चुके हैं, जबकि कई अन्य मकानों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गई हैं. घरों में रखा खाद्यान्न पानी में सड़ गया है और बच्चों की किताबें तथा कॉपियां भी नष्ट हो गई हैं. जिन परिवारों के सिर पर कभी पक्की छत थी, वे अब सड़क किनारे अस्थायी आश्रय बनाकर रहने को मजबूर हैं.
ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी हालात सामान्य नहीं हुए हैं. घरों में कीचड़ और मलबा जमा है, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ गया है. प्रभावित परिवारों के सामने भोजन, पेयजल और रहने की व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.
दो घंटे तक जिंदगी के लिए संघर्ष करता रहा मजदूर
बाढ़ के दौरान हुई एक दर्दनाक घटना ने पूरे इलाके को झकझोर दिया. अष्टभुजी मंदिर के पास बिहार निवासी मजदूर आकाश तेज बहाव में फंस गया. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार वह करीब दो घंटे तक एक पत्थर को पकड़कर अपनी जान बचाने की कोशिश करता रहा. वह लगातार मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन समय रहते राहत और बचाव दल मौके पर नहीं पहुंच सका.
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि तत्काल बचाव अभियान चलाया जाता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी. लेकिन राहत पहुंचने से पहले ही उफनते पानी का बहाव उसे अपने साथ बहा ले गया. इस घटना के बाद आपदा प्रबंधन की तैयारियों और प्रशासनिक सक्रियता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं.
प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत में अंतर
बाढ़ के बाद प्रशासन की ओर से राहत और बचाव कार्यों के दावे किए जा रहे हैं. रीवा संभाग के कमिश्नर शैलेंद्र सिंह ने भी कहा कि आपदा प्रबंधन की टीमें लगातार काम कर रही थीं और प्रभावित क्षेत्रों पर नजर बनाए हुए थीं. हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि व्यवस्थाएं इतनी प्रभावी थीं तो एक व्यक्ति को घंटों तक मदद का इंतजार क्यों करना पड़ा और कई गांवों तक समय पर राहत क्यों नहीं पहुंच सकी.
ग्रामीणों का आरोप है कि संकट के दौरान प्रशासनिक अमला मौके पर सक्रिय नहीं दिखा और अधिकांश प्रयास कागजों तक ही सीमित रहे. लोगों का कहना है कि जब गांव पानी में डूबे हुए थे तब कोई ठोस राहत नहीं मिली, जबकि अब बाढ़ बीत जाने के बाद सर्वे और आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया शुरू की गई है.
दो दिन बाद जारी हुए सर्वे के आदेश
बाढ़ की तबाही के बाद नुकसान का आकलन करने के लिए प्रशासन द्वारा पटवारी और तहसीलदारों को सर्वे के निर्देश दिए गए हैं. लेकिन यह आदेश तब जारी हुए जब आपदा को दो दिन से अधिक समय बीत चुका था। इसे लेकर ग्रामीणों में नाराजगी है. उनका कहना है कि तत्काल राहत और पुनर्वास की जरूरत थी, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी देर से सक्रिय हुई. प्रभावित परिवारों का सवाल है कि सर्वे के आदेश से उन्हें तत्काल राहत कैसे मिलेगी. जिन लोगों के घर टूट चुके हैं और जिनकी पूरी गृहस्थी बर्बाद हो गई है, उन्हें तत्काल सहायता और पुनर्वास की आवश्यकता है.
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी उठे सवाल
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी को लेकर भी लोगों में नाराजगी दिखाई दे रही है. ग्रामीणों का आरोप है कि आपदा के बाद भी कई जनप्रतिनिधि प्रभावित गांवों तक नहीं पहुंचे और पीड़ित परिवारों का हाल तक नहीं जाना. लोगों का कहना है कि चुनाव के समय जनता के बीच रहने वाले नेता संकट की घड़ी में नजर नहीं आए.
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