मध्य प्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक ‘संबल योजना’, जिसका मकसद गरीब और बेसहारा परिवारों को अपनों की मौत पर आर्थिक सहारा देना है. लेकिन मऊगंज जिले के हनुमना जनपद में इसी योजना को भ्रष्टाचार की बलि चढ़ा दिया गया. 25 लाख रुपये के इस संबल घोटाले ने अब एक नया और चौंकाने वाला मोड़ ले लिया है. ‘विस्तार न्यूज’ की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में जो सच सामने आया है, उसने पूरी जांच व्यवस्था और प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल यह कि जिस अफसर पर घोटाले में शामिल होने के आरोप हों, क्या वही अपनी जांच की रिपोर्ट तैयार कर सकती है?
क्या है पूरा मामला
कहते हैं मऊगंज अजब है और यहां के प्रशासनिक कारनामे सबसे गजब! हनुमना जनपद में गरीबों के हक पर डाका डालते हुए 25 लाख रुपये का संबल घोटाला अंजाम दिया गया. सामान्य मौतों को कागजों पर ‘एक्सीडेंटल डेथ’ दिखाकर लाखों रुपये की हेराफेरी की गई. लेकिन जब घोटाले का भांडा फूटा, तो जांच के नाम पर जो खेल हुआ, उसने पूरे तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
घोटाले में कुल 4 प्रभारी सीईओ के कार्यकाल की भूमिका संदिग्ध थी, लेकिन जांच का जिम्मा सौंपा गया सुरभि श्रीवास्तव को, जो खुद इस फर्जीवाड़े की मुख्य में से एक थीं! फिर क्या था, खुद ही जांचकर्ता और खुद ही मुजरिम! परिणाम वही हुआ जिसकी उम्मीद थी, जांच अधिकारी सुरभि श्रीवास्तव ने खुद को और अपने दो साथी सीईओ (रश्मि चतुर्वेदी और कमलेश पुरी) को क्लीन चिट दे दी, जबकि सारा ठीकरा 5 मैदानी कर्मचारियों और एक अन्य सीईओ पर फोड़ दिया गया।
कैसे की गई कागजों की जादूगरी
दीपू गिरी की सामान्य मृत्यु हुई थी, जिसे कागजों में एक्सीडेंटल मौत बताकर 4 लाख रुपये निकालने की कवायद शुरू हुई. तत्कालीन प्रभारी सीईओ रश्मि चतुर्वेदी ने इस राशि की स्वीकृति (Sanction) दी। बाद में प्रभार बदला और जगदीश सिंह राजपूत ने डिजिटल सिग्नेचर से भुगतान किया. लेकिन जांच रिपोर्ट का कमाल देखिए. जिस अधिकारी (रश्मि चतुर्वेदी) ने फाइल पास की, उसे क्लीन चिट मिल गई और जिसने महज भुगतान प्रक्रिया पूरी की (जगदीश सिंह), उसे दोषी बना दिया गया।
सामने आए कई मामले
वहीं, शिवानी साहू केस:ग्राम पंचायत देवरा की शिवानी साहू की मृत्यु पानी में डूबने से हुई थी. नियमानुसार इसका मुआवजा राजस्व विभाग को देना था. लेकिन संबल योजना से फर्जी तरीके से एक्सीडेंटल डेथ दिखाकर 4 लाख रुपये सुरभि श्रीवास्तव के कार्यकाल में जारी कर दिए गए. खास बात यह कि जब जांच बैठी, तो सुरभि श्रीवास्तव ने ही जांच अधिकारी बनकर खुद को बेदाग साबित कर दिया और मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया.
अब तीसरा मामला – विष्णु पटेल के केस का है:इसी देवरा गांव के विष्णु पटेल की सामान्य मौत को भी एक्सीडेंटल बनाया गया. नियम के मुताबिक 2 लाख रुपये का भुगतान होना था, लेकिन तत्कालीन प्रभारी सीईओ कमलेश पुरी के कार्यकाल में 4 लाख रुपये की राशि निकालकर फर्जीवाड़ा किया गया.
भ्रष्टाचार के मगरमच्छों ने निगला गरीबों का हक
इस पूरे खेल में सरपंच, सचिव, सहायक सचिव, शाखा प्रभारी समेत 6 लोगों को तो बलि का बकरा बना दिया गया.लेकिन नीतिगत फैसले लेने वाले और डिजिटल साइन से फंड जारी करने वाले तीन-तीन जनपद सीईओ और अहम भूमिका अदा करने वाले कंप्यूटर ऑपरेटर साफ बच निकले.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भ्रष्टाचारी ही खुद अपनी जांच करेगा? और क्या मऊगंज का जिला प्रशासन इस लीपापोती वाली जांच को रद्द कर किसी निष्पक्ष एजेंसी से इस 25 लाख के घोटाले की दोबारा जांच कराएगा? देखना दिलचस्प होगा
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