Holika Dahan 2026: हिन्दू धर्मग्रंथों में होली को अत्यंत पवित्र त्योहार बताया गया है. इस साल होली 4 मार्च को मनाई जाएगी, जिसके लिए लोग अभी से अबीर और गुलाल की व्यवस्था में जुट गए हैं. होली न केवल रंगों का त्योहार है, बल्कि यह आपसी गिले-शिकवे भुलाकर नए रिश्तों की शुरुआत करने का भी दिन है. जहां एक ओर होली के पास आते ही गुलाल की खुशबू महकने लगी है, वहीं दूसरी ओर देश में एक ऐसा गांव भी है जहां होलिका दहन नहीं किया जाता. इस गांव में यह परंपरा आज से नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही है. ऐसे में आइए जानते हैं कि वह कौन सा गांव है और इसके पीछे की मुख्य वजह क्या है.
किस गांव में होलिका दहन नहीं होता है?
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित बरसी (Barsi) गांव के लोग होली का त्योहार तो बड़े धूमधाम से मनाते हैं, लेकिन यहां होलिका दहन नहीं किया जाता. ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा हजारों साल पहले महाभारत काल से चली आ रही है.
होलिका दहन क्यों नहीं होता?
मान्यता है कि बरसी गांव के पश्चिमी छोर पर भगवान भोलेनाथ का एक प्राचीन मंदिर है, जहां स्वयं भगवान शिव वास करते हैं. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यदि गांव में होलिका दहन किया गया, तो उसकी आग की लपटें सीधे भगवान शिव के चरणों तक पहुंचेंगी, जिससे उनके पांव झुलस सकते हैं. इसी गहरी आस्था के कारण हजारों वर्षों से आज तक इस गांव में होलिका दहन की रस्म नहीं निभाई जाती है.
क्या है ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यता?
बरसी गांव के इस ऐतिहासिक शिव मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों का मानना है कि यह महाभारत काल का एक अत्यंत पवित्र सिद्धपीठ है, जहां प्राचीन समय से ही प्राकृतिक रूप से स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है. इस मंदिर की महिमा से कई पुरानी कहानियां जुड़ी हुई हैं, जिनमें से एक मुख्य मान्यता के अनुसार, इसका निर्माण कौरव राजकुमार दुर्योधन ने करवाया था.
मंदिर की एक और रोचक कथा यह है कि जब पांडव पुत्र भीम को पता चला कि इसे कौरवों ने बनवाया है, तो उन्होंने अपनी गदा के प्रहार से मंदिर का मुख पूर्व से पश्चिम की ओर मोड़ दिया था, जिस कारण इसे आज भी पश्चिममुखी शिव मंदिर कहा जाता है.
गांव का नाम बरसी कैसे पड़ा?
- बरसी गांव के लोगों का मानना है कि मंदिर की दिशा में बदलाव गांव की सुरक्षा और संतुलन के लिए जरूरी था.
- मान्यता है कि महाभारत युद्ध के समय भगवान कृष्ण भी यहां रुके थे और उन्होंने इस स्थान को ‘बृज’ कहा था, जिससे इसका नाम ‘बरसी’ पड़ा.
- आज भी परंपरा का पालन करते हुए यहां होलिका दहन नहीं किया जाता, क्योंकि ग्रामीणों का विश्वास है कि अग्नि से साक्षात विराजमान भगवान शिव के चरण झुलस सकते हैं.
