Vistaar NEWS

पत्नी पर क्रूरता का आरोप साबित नहीं, हाईकोर्ट ने तलाक का फैसला किया रद्द

cg highcourt

सीजी हाई कोर्ट

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में पत्नी के खिलाफ लगाए गए क्रूरता के आरोप पर्याप्त साक्ष्यों से साबित नहीं होने पर फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को रद्द कर दिया है. जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने कहा कि पति-पत्नी के बीच मतभेद, अलग रहना या ससुराल पक्ष के साथ रहने को लेकर असहमति को मात्र इसी आधार पर वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री निरस्त कर दी. (Chhattisgarh High Court divorce verdict)

मामले के अनुसार, दोनों पक्ष ईसाई समुदाय से हैं. उनका विवाह 25 जुलाई 2016 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत दुर्ग में हुआ था. इसके बाद 24 फरवरी 2017 को भिलाई के सेक्टर-6 स्थित चर्च में सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह हुआ. पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी उसके माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती थी और उसे माता-पिता से अलग रहने के लिए मजबूर करती थी. पति का यह भी कहना था कि पत्नी लंबे समय तक ससुराल नहीं लौटी तथा उसके माता-पिता और रिश्तेदारों के साथ दुर्व्यवहार किया. उसने वैवाहिक और शारीरिक संबंधों से दूर रखने का आरोप भी लगाया.

पत्नी ने आरोपों से किया इनकार

पत्नी ने पति के आरोपों को नकारते हुए कहा कि वह वैवाहिक जीवन जारी रखने और पति के साथ रहने के लिए हमेशा तैयार थी. उसका कहना था कि दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते थे और परिवार की सहमति नहीं होने के बावजूद विवाह किया था. पत्नी के अनुसार, पति के माता-पिता ने उसे स्वीकार नहीं किया और विवाह के बाद भी उसे ससुराल नहीं ले जाया गया.

पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि वह करीब 10 महीने तक पति के साथ रही और इसी दौरान गर्भवती हुई. उसके अनुसार, पति द्वारा तीन बार धक्का-मुक्की किए जाने के कारण उसका गर्भपात हो गया. इसके बाद पति उसे बिना बताए अपने माता-पिता के पास चला गया. उसने कहा कि वह पति के साथ वैवाहिक जीवन जारी रखना चाहती थी.

क्रूरता के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी

फैमिली कोर्ट ने पति के आरोपों को आधार मानते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की थी. इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की. पत्नी की ओर से अधिवक्ता कर्टिस कॉलिन्स ने तर्क दिया कि केवल आरोपों के आधार पर वैवाहिक क्रूरता साबित नहीं होती, बल्कि इसके लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं. वहीं पति की ओर से अधिवक्ता पूणेंद्र खिचरिया ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही बताते हुए अपील खारिज करने का आग्रह किया. (Chhattisgarh High Court divorce verdict)

हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता का निष्कर्ष केवल पति-पत्नी के बीच मतभेद या अलग रहने के आधार पर नहीं निकाला जा सकता. जिस व्यवहार को क्रूरता बताया गया है, उसका प्रमाण होना चाहिए और वह इतना गंभीर होना चाहिए कि वैवाहिक संबंध जारी रखना असहनीय हो जाए.

पत्नी के साथ रहने की इच्छा को भी माना महत्वपूर्ण

डिवीजन बेंच ने रिकॉर्ड में मौजूद पत्नी के बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि उससे यह स्पष्ट होता है कि वह पति के साथ रहना चाहती थी. पति ने भी जिरह के दौरान स्वीकार किया था कि पत्नी उसके साथ रहना चाहती थी और दोनों के 

बीच कोई बड़ा झगड़ा नहीं था.

हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट का निष्कर्ष मुख्य रूप से पति द्वारा लगाए गए आरोपों पर आधारित था. पत्नी के बचाव और मामले की परिस्थितियों का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया. उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि पत्नी का व्यवहार विशेष विवाह अधिनियम के तहत तलाक देने के लिए आवश्यक स्तर की वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में आता है. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की विवाह विच्छेद की डिक्री निरस्त कर दी.

ये खबर भी जरूर पढ़ेंः  राज्य अलंकरण 2026: 13 क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रतिभाओं को मिलेगा सम्मान, 5 अक्टूबर तक कर सकेंगे आवेदन

Exit mobile version