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Raisen: ओशो की जन्मस्थली कुचवाड़ा उपेक्षा का शिकार, ना सड़क-ना साइन बोर्ड, वादे रह गए अधूरे

raisen Osho birthplace Kuchwada suffers from neglect

ओशो की जन्मस्थली कुचवाड़ा

Raisen News (विजय सिंह राठौर की रिपोर्ट): गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आज जहां पूरी दुनिया अपने आध्यात्मिक गुरुओं के चरणों में श्रद्धा निवेदित कर रही है, वहीं रायसेन जिले का छोटा सा गांव कुचवाड़ा अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. यह वही ऐतिहासिक माटी है, जहां 11 दिसंबर 1931 को ‘ओशो’ (आचार्य रजनीश) का जन्म हुआ था. जिस दार्शनिक ने पूरी दुनिया को ध्यान, जीवन और आत्मबोध की एक नई क्रांति से परिचित कराया और भारतीय दर्शन को वैश्विक पटल पर स्थापित किया, आज उसी की जन्मस्थली सरकारी उदासीनता और बुनियादी सुविधाओं के अकाल से जूझ रही है.

​चमकता वैश्विक नाम, अंधेरे में डूबा कुचवाड़ा

​ध्यान और अध्यात्म की दुनिया में ओशो का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. अमेरिका, यूरोप से लेकर एशिया तक आज भी उनके करोड़ों अनुयायी मौजूद हैं और उनके विचार गूंज रहे हैं. लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिस गांव से इस महान जीवन की शुरुआत हुई, वहां का परिदृश्य आज भी उपेक्षा की कहानी बयां करता है. देश-विदेश से कुचवाड़ा पहुंचने वाले ओशो प्रेमी और पर्यटक जब यहां बुनियादी सुविधाओं के तरसते हालात देखते हैं, तो उन्हें गहरा आघात पहुंचता है. विश्व प्रसिद्ध संत के जन्मस्थली की सूचना देने वाला कोई साइन बोर्ड तक यहां पहुंचने वाले सड़क मार्ग पर नहीं लग पाया है.

​कागजी वादे और गुटबाजी का शिकार ‘कुचवाड़ा’

​सालों से कुचवाड़ा के संरक्षण और कायाकल्प के लंबे-चौड़े दावे तो किए गए, लेकिन वे सिर्फ फाइलों और नेताओं के बयानों तक सिमट कर रह गए. स्थानीय निवासियों के मुताबिक, जन्मस्थली के पिछड़ने की एक बड़ी वजह ओशो अनुयायियों के विभिन्न गुटों के बीच सालों से जारी आपसी खिंचाव और मतभेद भी हैं. गुटबाजी की इस खींचतान ने गांव के सुनियोजित विकास की राह में रोड़े अटकाए, तो दूसरी तरफ शासन-प्रशासन की आपराधिक उपेक्षा ने स्थिति को और बदतर बना दिया. नतीजा यह है कि एक विश्वविख्यात दार्शनिक की जन्मभूमि अपने हक के सम्मान और पहचान के लिए आज भी तरस रही है।

​वीआईपी दौरों के बावजूद ‘ढाक के वही तीन पात’

​बीते वर्षों में प्रख्यात कथावाचक मुरारी बापू ने कुचवाड़ा पहुंचकर ओशो की जन्मस्थली पर ध्यान लगाया था और इसके संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया था. इसके बाद संस्कृति मंत्री प्रहलाद पटेल ने भी गांव का दौरा कर इसके सौंदर्यीकरण और समग्र विकास का झुनझुना थमाया था. इन बड़े दौरों से ग्रामीणों के दिलों में उम्मीद की किरण तो जागी थी, लेकिन वक्त बीतने के साथ ज़मीनी हकीकत आज भी “ढाक के तीन पात” जैसी ही बनी हुई है.

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​पर्यटन केंद्र बनने की अपार क्षमता

​क्षेत्र के प्रबुद्धजनों का स्पष्ट मानना है कि यदि कुचवाड़ा को एक ठोस और योजनाबद्ध रणनीति के तहत विकसित किया जाए, तो यह गांव सांची और भीमबैठका की तरह ही अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक पर्यटन (Spiritual Tourism) का एक बड़ा केंद्र बन सकता है. इससे न केवल रायसेन जिले का नाम वैश्विक नक्शे पर चमकेगा, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और विदेशी मुद्रा की आवक भी बढ़ेगी.

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या शासन-प्रशासन ओशो की इस पावन जन्मस्थली को उसका खोया हुआ गौरव लौटाने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा, या फिर हर बार की तरह यह मुद्दा केवल बयानों और खोखली घोषणाओं की बलि चढ़ता रहेगा?

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