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MP News: एक बार फिर गरमाया 103 अपात्र कर्मचारियों का मामला, हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी नियमों के उल्‍लंघन का आरोप

MP Gwalior High Court (File Photo)

MP ग्वालियर हाई कोर्ट(File Photo)

रिपोर्ट – मनोज शर्मा

MP News: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के 9 जुलाई 2026 के आदेश के बाद 30 जुलाई 2009 के शासनादेश के क्रियान्वयन को लेकर एक बार फिर मामला चर्चा में आ गया है. याचिकाकर्ता सुरेश सिंह सिकारवार ने 20 जुलाई 2026 को प्रमुख सचिव, लोक शिक्षण आयुक्त, मुरैना और श्योपुर कलेक्टर सहित संबंधित अधिकारियों को विस्तृत अभ्यावेदन सौंपकर शासनादेश के तत्काल पालन की मांग की है.

स्क्रीनिंग समिति के फैसले का हवाला

अभ्यावेदन में दावा किया गया है कि वर्ष 1995 में निजी शिक्षण संस्थाओं के शासकीयकरण के दौरान गठित दूसरी स्क्रीनिंग समिति ने 131 कर्मचारियों में से केवल 28 को पात्र और 103 कर्मचारियों को शासकीय सेवा के लिए अपात्र घोषित किया था. इसके आधार पर 30 जुलाई 2009 को शासन ने 103 कर्मचारियों को सेवा से पृथक करने का आदेश जारी किया था.

हाई कोर्ट के निर्णय के बाद भी नहीं हुआ पालन

याचिकाकर्ता का कहना है कि बाद में हाईकोर्ट द्वारा समीक्षा याचिका क्रमांक 298/2009 के निर्णय में भी 30 जुलाई 2009 के शासनादेश को वैध माना गया, लेकिन इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने आज तक आदेश का पालन नहीं किया. अभ्यावेदन में आरोप लगाया गया है कि अपात्र घोषित कर्मचारी अब भी सेवा में बने हुए हैं और वेतन, वेतनवृद्धि, पदोन्नति तथा अन्य वित्तीय लाभ प्राप्त कर रहे हैं, जिससे शासन को लगातार आर्थिक नुकसान हो रहा है.

शासन के रिकॉर्ड का भी किया गया उल्लेख

अभ्यावेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि विभिन्न सरकारी आदेशों और विभागीय अभिलेखों में स्वयं शासन ने 30 जुलाई 2009 के आदेश को प्रभावी माना है, फिर भी उसके क्रियान्वयन में लापरवाही बरती जा रही है.

कार्रवाई की मांग

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि 30 जुलाई 20 09 के शासनादेश को तत्काल लागू किया जाए, 103 अपात्र कर्मचारियों की सेवा स्थिति की जांच की जाए तथा इतने वर्षों तक आदेश लागू न करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जाए.

हाई कोर्ट ने दिए तीन माह में निर्णय के निर्देश

गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर सभी प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अवसर देकर तीन माह के भीतर कारणयुक्त (स्पीकिंग) आदेश पारित किया जाए. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है.

जिला शिक्षा अधिकारी पर नियम विरुद्ध वित्तीय अधिकार देने का आरोप

अभ्यावेदन में यह भी आरोप लगाया गया है कि हाईकोर्ट के आदेश का पालन किए बिना जिला शिक्षा अधिकारी, मुरैना ने राजेंद्र सिंह सिकारवार को मुरैना ब्लॉक शिक्षा अधिकारी तथा रामअवतार सिंह को पहाड़गढ़ ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के साथ-साथ आहरण एवं संवितरण (वेतन) संबंधी वित्तीय अधिकार भी सौंप दिए. आरोप है कि यह निर्णय नियमों के विपरीत लिया गया.

आदेश की शर्तों के उल्लंघन का आरोप

अभ्यावेदन के अनुसार, राजेंद्र सिंह सिकारवार के संबंध में जारी आदेश में स्पष्ट रूप से केवल कार्य करने की अनुमति दिए जाने का उल्लेख है. इसके बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी ने नियमों का उल्लंघन करते हुए उन्हें वित्तीय अधिकार भी प्रदान कर दिए. इसे शासन के नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत बताते हुए मामले की जांच तथा जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की गई है.

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