Balaghat News (राहुल टेभरे की रिपोर्ट): राखी का त्योहार, भाई-बहन के अटूट रिश्ते का प्रतीक है, लेकिन बालाघाट की संघमित्रा खोब्रागड़े के लिए इस बार की राखी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आठ साल लंबे इंतजार के खत्म होने की कहानी है. जिस भाई को दुनिया ने मृत मान लिया था, उसके जिंदा होने की खबर जब पाकिस्तान की जेल से मिली, तो बहन की मरी हुई उम्मीदों में फिर जान आ गई. भाई प्रसन्नजीत रंगारी करीब सात साल पाकिस्तान की जेल में कैद रहा. इस दौरान बहन ने प्रण लिया कि वह अपने भाई के अलावा किसी और को राखी नहीं बांधेगी. फरवरी 2026 में प्रसन्नजीत वतन लौट आया है. आज वही राखी बहन अपने भाई की कलाई पर बांध रही है. हालांकि इस मिलन के बीच पिता को खोने का दर्द और भाई की मानसिक स्थिति की चिंता आज भी परिवार के साथ है.
क्या है पूरा मामला?
बात आठ साल पुरानी है, जब प्रसन्नजीत घर से लापता हो गया था. साल 2011 में फार्मेसी की पढ़ाई की पोस्ट ग्रेजुएशन की तैयारी करने वाला प्रसन्नजीत अचानक मानसिक रूप से बीमार पड़ गया. साल 2018 में वह घर से निकला तो लौट ही नहीं. काफी तलाश के सभी रिश्तेदारों ने उसे मृत मान लिया था, लेकिन बहन संघमित्रा को भरोसा था कि भाई जिन्दा है और वह एक दिन जरूर लौटेगा. इसी विश्वास मे बंधी बहन हर दिन राह ताकती थी, फिर एक दिन पाकिस्तान की जेल से छूटे कुलजीत सिंह कछवाहा नामक व्यक्ति का एक फोन आया और फिर सारी उम्मीदें जिंदा हो गईं. इसी के बाद शुरु हुआ बहन संघमित्रा का संघर्ष.
लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद रहे
संघमित्रा खोब्रागड़े ने बताया कि दिसंबर 2021 को पता चला था कि भाई प्रसन्नजीत पाकिस्तान के लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद है. एक तरफ बेटे के खोने के दर्द में मानसिक संतुलन खो चुकी मां थी, जो गांव में मांग कर खाना खाती थी. एक पिता थे, जो बेटे की याद दिन भर रोते थे. गरीबी की चलते बहन ने पिता को बालाघाट के एक वृद्धा आश्रम में रखा. इनको संभालने का जिम्मा बहन संघमित्रा के सिर पर था कि अब पाकिस्तान की जेल में बंद भाई को मां-बाप से मिलाने की जिम्मेदारी भी आ गई.
30 अप्रैल को शुरू हुई कागजी प्रक्रिया
पाकिस्तान की जेल में बंद भाई प्रसन्नजीत को अपने मां-बाप से मिलाने की जिद संघमित्रा के सिर पर सवार थी. एक तरफ बूढ़े मां-बाप और दूसरी तरफ पाकिस्तान की जेल में बंद भाई को छुड़ाने की जिम्मेदारी. ऐसे में उम्मीद खो चुकी संघमित्रा को कुछ सूझ नहीं रहा था. कड़े संघर्ष और तमाम प्रयासों के बाद 30 अप्रैल को कागजी प्रक्रिया हुई. बहन संघमित्रा का एक वीडियो रिकॉर्ड किया गया और उसे पाकिस्तान भेजा गया. जब प्रसन्नजीत की वतन वापसी की उम्मीदें तेज हुई तो उनके पिता लोपचंद रंगारी दुनिया छोड़ गए.
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फरवरी माह मे पाकिस्तान की जेल से निकलकर प्रसन्नजीत को अटारी-वाघा बॉर्डर से अमृतसर पुलिस के हवाले कर दिया गया. जिसके बाद स्थानीय प्रशासन ने हस्तक्षेप कर प्रसन्नजीत घर पंहुचाया. भाई के लापता होने के बाद बहन संघमित्रा ने प्रण लिया था कि अपने भाई के अलावा वह किसी को राखी नहीं बांधेगी. भाई की राह ताकती एक बहन ने आठ साल अपने ही भाई को राखी बांधकर रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया है और भाई बहन के अटूट रिश्ते की मिशाल बन गई.
