15 साल पहले घर से बिछड़ा बेटा, 1500 किलोमीटर दूर तमिलनाडु पहुंचा; बालाघाट में पुलिस ने युवक को परिवार से मिलवाया

15 साल पहले घर से बिछड़ा बेटा, जिसे परिवार ने लगभग खो दिया था, आखिरकार वापस अपने आंगन लौट आया. तमिलनाडु से आई एक चिट्ठी ने बुझ चुकी उम्मीदों में फिर से रोशनी भर दी और बालाघाट पुलिस की संवेदनशील पहल ने एक मां की सूनी गोद और पिता के सूने आंगन में खुशियां लौटा दीं.
A missing young man reunited with his family after 15 years

लापता युवक 15 साल बाद अपने परिवार से मिला.

MP News: कहते हैं, मां की दुआएं कभी खाली नहीं जातीं और पिता का इंतजार कभी खत्म नहीं होता. बालाघाट जिले के खैरलांजी थाना क्षेत्र के खुर्सीपार गांव से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दी हैं. 15 साल पहले घर से बिछड़ा बेटा, जिसे परिवार ने लगभग खो दिया था, आखिरकार वापस अपने आंगन लौट आया. तमिलनाडु से आई एक चिट्ठी ने बुझ चुकी उम्मीदों में फिर से रोशनी भर दी और बालाघाट पुलिस की संवेदनशील पहल ने एक मां की सूनी गोद और पिता के सूने आंगन में खुशियां लौटा दीं.

2010 में घर से अचानक हो गया था लापता

साल 2010 की बात है, जब खुर्सीपार गांव का रहने वाला आशीष साखरे अचानक घर से लापता हो गया. मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रहे आशीष के अचानक गायब हो जाने से परिवार की दुनिया ही उजड़ गई. शुरुआती दिनों मां गीता साखरे हर दरवाजे पर बेटे का नाम पुकारती रहीं. पिता ने रिश्तेदारों, परिचितों और पुलिस थानों के चक्कर लगाए. जहां भी बेटे के मिलने की उम्मीद जगी, वहां तक पहुंचे, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी.

एक चिट्ठी ने परिवार की खुशियां लौटा दीं

वक्त बीतता गया, दिन महीनों में और महीने वर्षों में बदलते गए। पिता की आंखें बेटे की राह देखते-देखते थक गईं. मां की रातें आंसुओं में कटने लगीं। हर त्योहार पर थाली में एक रोटी ज्यादा बनती, इस उम्मीद में कि शायद आज बेटा लौट आए. घर के दरवाजे की हर आहट पर मां का दिल धड़क उठता, लेकिन सामने खामोशी ही खड़ी मिलती. धीरे-धीरे परिवार ने हालात से समझौता कर लिया, लेकिन एक मां का विश्वास कभी नहीं टूटा. उसे यकीन था कि उसका बेटा एक दिन जरूर लौटेगा. फिर वही उम्मीद विश्वास में बदली और 03 जून को खुर्सीपार के पते पर एक चिट्ठी घर पहुंची. यह कोई साधारण खत नहीं था, बल्कि 15 साल से सूनी पड़ी जिंदगी में खुशियों का संदेश लेकर आया था. उस चिट्ठी में लिखा था….आपका बेटा जिंदा है…!

भटकते हुए 1500 किलोमीटर दूर तमिलनाडु पहुंचा युवक

दरअसल, घर से निकलने के बाद आशीष भटकते-भटकते करीब 1500 किलोमीटर दूर तमिलनाडु के थालावड़ी पहुंच गया था. वहां एक संस्था ने उसे सहारा दिया। उसका इलाज हुआ और उसकी देखभाल की गई. करीब 12 वर्षों तक वह वहीं रहा. समय के साथ उसकी याददाश्त लौटने लगी. उसे अपनी नानी, अपना गांव और अपने परिवार की धुंधली तस्वीरें याद आने लगीं. उसने घर लौटने की इच्छा जताई, जिसके बाद एक व्यक्ति ने उसके बताए पते पर चिट्ठी भेज दी.

परिवार के साथ पुलिस तमिलनाडु से वापस लेकर लौटी

जब परिवार को बेटे के जीवित होने की खबर मिली तो खुशी के साथ एक नई चिंता भी सामने थी. आर्थिक तंगी के कारण तमिलनाडु जाकर उसे वापस लाना आसान नहीं था. ऐसे में बालाघाट पुलिस की हमदर्द सेल परिवार का सहारा बनी. एएसआई शैलेंद्र शुक्ला और पुलिस टीम आशीष के भाई-बहन को लेकर तमिलनाडु पहुंची और उसे सुरक्षित घर वापस लेकर आई.

बेटे को देखते ही मां फूट-फूटकर रो पड़ीं

15 साल बाद जब आशीष ने अपने घर की चौखट पर कदम रखा, तो मां गीता साखरे उसे देखकर फूट-फूटकर रो पड़ीं। पिता की आंखों से भी बरसों से थमे आंसू छलक पड़े. यह सिर्फ बेटे की घर वापसी नहीं थी, बल्कि एक मां की अटूट ममता, पिता के धैर्य और उम्मीद की जीत थी. जिसने यह साबित कर दिया कि वक्त चाहे कितना भी लंबा क्यों न हो, अपनों के लौट आने की आस कभी मरती नहीं. आज साखरे परिवार के आंसू गम के नहीं, बल्कि उस खुशी के हैं, जिसका इंतजार उन्होंने पूरे 15 साल तक किया.

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