Mandla Unique Bank: मंडला के इस गांव में है अनोखा बैंक! जहां रुपये-पैसे नहीं, बीजों का होता है लेन-देन

Mandla Unique Bank: पांगरी गांव के इस नए बीज बैंक को समृद्ध बनाने के लिए महिला समूह ने लहरी बाई से ही दुर्लभ बीज प्राप्त किए हैं. आज इस बैंक में 50 से ज्यादा वैरायटी के पारंपरिक बीज उपलब्ध हैं.
mandla unique bank where exchange of seeds takes place

मंडला: आदिवासी महिलाओं ने मिलकर तैयार किया बीज बैंक

Mandla Unique Bank: (आरके बघेल की रिपोर्ट) रुपये-पैसों के बैंक तो आपने बहुत देखे होंगे, जहां पैसों का नहीं बल्कि ‘पुश्तैनी धरोहर’ यानी पारंपरिक बीजों का लेन-देन होता है. आदिवासी बाहुल्य मण्डला और डिंडोरी जिलों से आत्मनिर्भरता की एक ऐसी गूंज उठी है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है. देश की प्रसिद्ध ‘मिलेट क्वीन ऑफ इंडिया’ लहरी बाई के मार्गदर्शन में अब मंडला की आदिवासी महिलाओं ने भी विलुप्त हो रहे मोटे अनाजों को बचाने की एक ऐतिहासिक शुरुआत की है.

पांगरी गांव की महिलाओं ने की पहल

मध्य प्रदेश के मंडला जिले का विकासखंड बिछिया और उसका छोटा सा गांव है पांगरी. यहां की आदिवासी महिलाओं ने मिलकर एक ऐसी मिसाल कायम की है जो आने वाले समय में कृषि और पर्यावरण की दिशा बदल देगी. आदिवासी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से यहां ‘कुटकी रानी उत्पादक बीज बैंक कृषक महिला समिति’ की स्थापना हुई है. यह सिर्फ एक बीज बैंक नहीं है बल्कि विलुप्त होती कृषि जैव विविधता को बचाने का एक महायज्ञ है. जिससे स्थानीय महिलाएं आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत लिख रही हैं.

बीज बैंक में 50 से ज्यादा दुर्लभ बीज

इस पूरी मुहिम के पीछे एक ऐसा नाम है जो आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है. डिंडोरी के सिलपीड़ी गांव की रहने वाली 36 वर्षीय बैगा आदिवासी महिला लहरी बाई पडिया जिन्हें दुनिया ‘मिलेट क्वीन ऑफ इंडिया’ के नाम से जानती है. बिना किसी सरकारी मदद के पिछले डेढ़ दशक से लहरी बाई ने अपने दम पर 150 से अधिक दुर्लभ प्रजाति के मोटे अनाजों (मिलेट्स) का देसी बीज बैंक तैयार किया है. अनपढ़ होने के बावजूद लहरी बाई ने वो कर दिखाया, जिसकी सराहना खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर चुके हैं और राष्ट्रपति भी उन्हें विशेष पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी हैं. पांगरी गांव के इस नए बीज बैंक को समृद्ध बनाने के लिए इस महिला समूह ने लहरी बाई से ही दुर्लभ बीज प्राप्त किए हैं. आज इस बैंक में 50 से ज्यादा वैरायटी के पारंपरिक बीज उपलब्ध हैं.

अनाज तिजोरी में क्या क्या रखा गया?

इन अनमोल बीजों को कीटों और मौसम की मार से लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए, इन ग्रामीण महिलाओं ने अपने पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए ‘मिट्टी की विशेष कोठियां’ तैयार की है. आदिवासियों की इस ‘अनाज तिजोरी’ में आखिर क्या-क्या छुपा है, भुरसा, सफेद कलकी, लाल कलकी और करिया कलकी कांग, सलहार की तीन किस्में बैगा, काटा और ऐंठी सलहार, बड़े, लदरी, बहेरी और छोटी कोदो, चावर, लाल, गोद पारी और मरामुठ मढिया हैं. इसके अलावा भालू, कुशवा और छिदरी जैसी सांभा की तीन प्रजातियां और कुटकी की तो करीब 11 दुर्लभ प्रजातियां जैसे बड़े डोंगर, सफेद डोंगर, लाल डोंगर, चार कुटकी, बिरनी, सिताही, नान बाई, नागदावन, छोटाही, भदेली कुटकी और सिकिया बीज यहाँ पूरी तरह सुरक्षित रखे गए हैं.

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रोजगार के नए रास्ते में खुलेंगे

मिलेट क्वीन ऑफ इंडिया लहरी बाई के इस अनोखे ‘सीड एक्सचेंज’ फॉर्मूले का असर यह हुआ कि चंद किलो से शुरू हुआ यह सफर आज अनाज धीरे-धीरे बढ़ रहा है. मण्डला के पांगरी गांव में खुला यह नया बीज बैंक न केवल लुप्त हो रही देसी फसलों को जीवनदान देगा बल्कि स्थानीय स्तर पर महिलाओं के लिए रोजगार और स्वावलंबन के नए द्वार भी खोलेगा. मिट्टी की महक और पारंपरिक ज्ञान के सहारे, इन आदिवासी महिलाओं ने साबित कर दिया है कि भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए अपनी जड़ों की ओर लौटना कितना जरूरी है.

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