MP News: जबलपुर: मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका खारिज कर दी है जिसमें राज्य में नए राज्यपाल की नियुक्ति की मांग की थी. जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया. बकौल कोर्ट जब तक नया राज्यपाल पदभार नहीं संभाल लेता, तब तक मौजूदा राज्यपाल अपने पद पर बने रह सकते हैं.
क्या है पूरा मामला ?
दरअसल, जबलपुर के जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. एमए खान ने यह याचिका दायर की थी. जिसमें उन्होंने तर्क दिया था कि, मौजूदा राज्यपाल का 5 साल का कार्यकाल पूरा हो चुका है. इसलिए उन्हें पद से हटा देना चाहिए.
हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस मांग को न सिर्फ कानूनी तौर से गलत बताया, बल्कि याचिकाकर्ता की योग्यता पर भी सवाल उठाए. डिवीजन बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता ने ‘मध्य प्रदेश हाईकोर्ट नियम, 2008’ के तहत जनहित याचिका दायर करने के लिए जो जरूरी शर्तें होती हैं, उनका पालन नहीं किया है. जनहित याचिका दायर करने वाले व्यक्ति को अपनी सामाजिक साख, जनहित से जुड़ी पृष्ठभूमि और याचिका दायर करने के पीछे की नेक नीयत (Bona fides) का खुलासा करना होता है, जो इस मामले में नहीं किया गया.
संवैधानिक पहलुओं को भी किया जिक्र
यही नहीं कोर्ट ने संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 156(3) का जिक्र किया. कोर्ट ने बताया कि संविधान में राज्यपाल का कार्यकाल 5 साल निर्धारित जरूर है, लेकिन इसी अनुच्छेद के परंतुक में यह भी साफ-साफ लिखा है कि अपने कार्यकाल की समाप्ति के बाद भी राज्यपाल तब तक अपने पद पर बने रहेंगे, जब तक उनका उत्तराधिकारी पदभार ग्रहण नहीं कर लेता.
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी किया जिक्र
अपने फैसले को और मजबूत करने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले का भी हवाला दिया. कोर्ट ने कृष्णा बल्लभ सहाय बनाम जांच आयोग (1969) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने भी यही माना था कि संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए राज्यपाल का पद खाली नहीं छोड़ा जा सकता. कार्यकाल खत्म होने के बाद भी उनका पद पर बने रहना पूरी तरह वैध है.
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