MP News: डिजिटल इंडिया के दौर में जहां साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश इस चुनौती से निपटने के लिए बुनियादी ढांचे के स्तर पर पिछड़ता नजर आ रहा है. बीते पांच वर्षों में प्रदेश में साइबर फ्रॉड, ऑनलाइन ठगी और हैकिंग के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है और लोगों ने करोड़ों रुपये गंवाए हैं. इसके बावजूद मध्य प्रदेश में अब तक साइबर फॉरेंसिक लैब स्थापित करने का कोई ठोस प्रस्ताव तक नहीं बन पाया है.
साइबार अपराध को लेकर आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकारी आंकड़ों और पुलिस रिकॉर्ड्स की मानें तो प्रदेश में लगभग हर दसवां व्यक्ति किसी न किसी रूप में साइबर ठगी का शिकार हो चुका है. ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड, फर्जी कॉल, लिंक के जरिए ठगी, सोशल मीडिया अकाउंट हैकिंग और फर्जी निवेश योजनाएं आम होती जा रही हैं. शिकायतें दर्ज तो हो रही हैं, लेकिन जांच की रफ्तार और तकनीकी साक्ष्य जुटाने में प्रदेश पुलिस को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.
एमपी में फॉरेंसिक लैब नहीं
चौंकाने वाली बात यह है कि देश के 27 राज्यों और कई केंद्र शासित प्रदेशों में साइबर फॉरेंसिक लैब स्थापित की जा चुकी हैं. हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, पुडुचेरी, उत्तराखंड, असम, मणिपुर, जम्मू-कश्मीर, मेघालय और गोवा जैसे छोटे राज्यों में भी साइबर फॉरेंसिक लैब काम कर रही हैं. यहां तक कि अरुणाचल प्रदेश जैसे सीमावर्ती राज्य में भी फॉरेंसिक लैब स्थापित की जा चुकी है.
इसके उलट, मध्य प्रदेश की स्थिति सिक्किम, नागालैंड और अंडमान-निकोबार जैसे कुछ ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ गिनी जा रही है, जहां अब तक साइबर फॉरेंसिक लैब नहीं बन पाई है. यह तब है जब मध्य प्रदेश देश के बड़े राज्यों में शामिल है और साइबर अपराध के मामलों में लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है.
फॉरेंसिक लैब न होने से क्या-क्या अभाव होता है?
- विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर फॉरेंसिक लैब के अभाव में मोबाइल, लैपटॉप, सर्वर, ई-मेल और डिजिटल ट्रांजैक्शन से जुड़े सबूतों की जांच में देरी होती है.
- कई मामलों में तकनीकी रिपोर्ट बाहर के राज्यों से मंगानी पड़ती है, जिससे केस कमजोर हो जाता है और आरोपी बच निकलते हैं.
लैब न होने पर सवाल उठ रहे
प्रदेश में बढ़ते साइबर अपराध और करोड़ों के नुकसान के बावजूद साइबर फॉरेंसिक लैब को लेकर कोई ठोस रोडमैप न होना अब सरकार के लिए सवाल बनता जा रहा है. विपक्ष इसे लापरवाही बता रहा है.
